अंटार्कटिका से आ रहे जलवायु परिवर्तन के खतरे का संकेत
अंटार्कटिकाः दिसंबर 2025 में वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के भविष्य को लेकर अब तक की सबसे गंभीर चेतावनियों में से एक जारी की है। अंटार्कटिका का विशाल थ्वेट्स ग्लेशियर, जिसे दुनिया भर में इसके विनाशकारी प्रभावों के कारण डूम्सडे ग्लेशियर कहा जाता है, अब पहले से कहीं अधिक तेजी से पिघल रहा है। अंतरराष्ट्रीय ग्लेशियोलॉजिस्ट टीम की ताजी रिपोर्ट के अनुसार, इस ग्लेशियर के पिघलने की गति पिछले दशक की तुलना में 20 प्रतिशत तक बढ़ गई है। यह वृद्धि जलवायु परिवर्तन के उस खतरनाक मोड़ को दर्शाती है जहाँ से वापसी का रास्ता बेहद कठिन है।
उपग्रह चित्रों और उन्नत रोबोटिक सबमरीन के माध्यम से की गई जांच में एक भयावह सच्चाई सामने आई है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि समुद्र का गर्म होता पानी इस ग्लेशियर के आधार को नीचे से काट रहा है। यह प्रक्रिया बाहर से दिखाई नहीं देती, लेकिन ग्लेशियर को अंदर से खोखला कर रही है। जैसे-जैसे गर्म पानी बर्फ के नीचे घुस रहा है, ग्लेशियर अपनी पकड़ खोता जा रहा है और समुद्र की ओर खिसक रहा है।
थ्वेट्स ग्लेशियर की महत्ता केवल इसके आकार तक सीमित नहीं है। यह पश्चिमी अंटार्कटिका की बर्फ की चादर के लिए एक प्लग या सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। यदि यह ग्लेशियर पूरी तरह से ढह जाता है, तो यह वैश्विक समुद्र स्तर को लगभग 65 सेंटीमीटर (दो फीट से अधिक) तक बढ़ा देगा। लेकिन असली चिंता यह है कि इसके हटने से आसपास के अन्य ग्लेशियर भी अस्थिर हो जाएंगे, जिससे समुद्र स्तर में कुल 3 मीटर तक की वृद्धि हो सकती है।
समुद्र स्तर में इतनी भारी वृद्धि का सीधा मतलब है कि मुंबई, न्यूयॉर्क, लंदन, टोक्यो और शंघाई जैसे दुनिया के प्रमुख तटीय शहर जलमग्न हो सकते हैं। शोधकर्ताओं का स्पष्ट कहना है कि अब केवल कार्बन उत्सर्जन कम करना पर्याप्त नहीं होगा। हमें भविष्य में आने वाली अपरिहार्य बाढ़ों और समुद्र के बढ़ते स्तर के अनुरूप अपने बुनियादी ढांचे को तैयार करना होगा। यह रिपोर्ट वैश्विक नीति निर्माताओं के लिए अंतिम वेक-अप कॉल है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाने का समय अब समाप्त होता जा रहा है।