Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
क्या भारत में नागरिकों को हासिल है पूरी आजादी? जानिए संविधान प्रदत्त 11 अधिकारों के साथ जुड़ी अहम का... क्या NDA में होगा बड़ा विस्तार? परिसीमन और महिला आरक्षण बिल के बीच DMK, NCP और अकाली दल के साथ आने क... महाराष्ट्र के सांगली में बड़ा हादसा: रेणावी घाट में दो ST बसों की आमने-सामने भीषण टक्कर स्वतंत्रता दिवस 2026: दिल्ली मेट्रो की विशेष व्यवस्था, लाल किला और जामा मस्जिद के लिए सुबह 4 बजे से ... अयोध्या पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, महंत परमहंस रामचंद्र दास के स्मृति समारोह में हुए शामिल 80वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्र के नाम संबोधन, देशवासि... PM मोदी और विदेश नीति पर टिप्पणी से गरमाई सियासत: राजनाथ सिंह और एकनाथ शिंदे ने राहुल गांधी को घेरा,... CJI सूर्य कांत विवाद के बाद सुर्खियों में NALSAR यूनिवर्सिटी, BCI ने वापस लिया निलंबन फैसला 4,200 करोड़ के लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे निर्माण में भ्रष्टाचार का आरोप, हाईकोर्ट ने मांगा जवाब 15 अगस्त को देश मनाएगा 80वां स्वतंत्रता दिवस, लाल किले पर समारोह के दौरान मौसम पर टिकीं निगाहें

जापान का लिग्नोसेट: लकड़ी से बना पहला उपग्रह

दो विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों ने यह कमाल कर दिखाया है

टोक्योः दिसंबर 2025 में अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया ने एक ऐसी उपलब्धि देखी है जो विज्ञान कथाओं जैसी लगती है। जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी और सुमितोमो फॉरेस्टरी के वैज्ञानिकों ने मिलकर दुनिया का पहला लकड़ी से बना उपग्रह लिग्नोसेट सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित कर दिया है। यह मिशन न केवल इंजीनियरिंग का एक उत्कृष्ट नमूना है, बल्कि अंतरिक्ष अन्वेषण को पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम भी है।

पहली नज़र में लकड़ी को अंतरिक्ष जैसे कठोर वातावरण के लिए अनुपयुक्त माना जा सकता है, जहाँ तापमान में भारी उतार-चढ़ाव और विकिरण का प्रभाव होता है। लेकिन जापानी शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला परीक्षणों में पाया कि अंतरिक्ष के निर्वात  में ऑक्सीजन की अनुपस्थिति के कारण लकड़ी न तो सड़ती है, न ही जलती है और न ही इसमें सिकुड़न आती है। इसके लिए मैगनोलिया की लकड़ी का उपयोग किया गया है, जो अपनी मजबूती और लचीलेपन के लिए जानी जाती है।

वर्तमान में अंतरिक्ष में हज़ारों मृत उपग्रह और मलबे के टुकड़े पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे हैं, जिन्हें स्पेस जंक कहा जाता है। जब एल्यूमीनियम और अन्य धातुओं से बने पारंपरिक उपग्रह अपना जीवनकाल समाप्त कर पृथ्वी के वायुमंडल में पुनः प्रवेश करते हैं, तो वे जलते समय एल्यूमिना के सूक्ष्म कण छोड़ते हैं। ये कण वर्षों तक ऊपरी वायुमंडल में रहकर सूर्य की रोशनी को परावर्तित करते हैं और ओजोन परत को गंभीर नुकसान पहुँचाते हैं। इसके विपरीत, लिग्नोसेट जैसा लकड़ी का उपग्रह वायुमंडल में प्रवेश करते ही पूरी तरह जलकर राख हो जाएगा, जिससे कोई भी विषाक्त अवशेष पीछे नहीं बचेगा।

इस प्रयोग की सफलता केवल उपग्रहों तक सीमित नहीं है। जापानी वैज्ञानिक इस तकनीक का उपयोग भविष्य में चंद्रमा और मंगल पर मानवीय बस्तियां बनाने के लिए करने की योजना बना रहे हैं। लकड़ी एक नवीकरणीय संसाधन है जिसे भविष्य में अंतरिक्ष में ही उगाया जा सकता है, जिससे पृथ्वी से भारी निर्माण सामग्री ले जाने की लागत कम होगी। यह मिशन तकनीकी विकास और पर्यावरणीय स्थिरता का एक अनूठा संगम है, जिसने नासा और ईएसए जैसी बड़ी एजेंसियों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है।