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बाबूजी धीरे चलना प्यार में जरा .. .. .. ..

भारतीय राजनीति में पुरानी कहावत है कि इंडियन पॉलिटिक्स में कोई स्थायी दोस्त अथवा दुश्मन नहीं होता है। इसलिए बिहार का विधानसभा चुनाव काफी रोचक परिस्थितियों को जन्म दे रहा है। मुख्य मुकाबला एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच है। वैसे अचानक से मैदान में प्रशांत किशोर के जनसुराज पार्टी की चर्चा भी जोर पकड़ चुकी है।

अब प्रशांत किशोर की पार्टी किसका वोट काटती है, इस पर भी चुनाव का अंतिम परिणाम निर्भर होता जा रहा है। शायद इसी वजह से कई ऐसे घटनाक्रम हुए, जिनसे यह साफ हो गया कि भाजपा के कथित चाणक्य यानी अमित शाह जनसुराज की चुनौतियों को रास्ते से हटाने तथा नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का नामित व्यक्ति बताने से बचने की चाल चल गये।

लेकिन अमित शाह की इन दोनों चालों का अंतिम असर क्या हुआ है, यह तो मतों की गणना के दिन ही साफ हो पायेगा। इस बीच अपने पहले चुनाव प्रचार में आये नरेंद्र मोदी ने इशारे से नीतीश कुमार को ही मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी होने का संकेत कर दिया। लेकिन नरेंद्र मोदी की जनसभा के मंच से चिराग पासवान को बोलने से रोका जाना एक नई राजनीतिक संभावना को जन्म दे गया है। यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले चुनाव में चिराग पासवान ने खुद को मोदी का हनुमान बताते हुए नीतीश कुमार का खुला विरोध किया था।

यह तो एक तरफ की बात है लेकिन इंडिया गठबंधन, जिसे बिहार में महागठबंधन भी कहा जाता है, अब झारखंड में नया विरोध झेल सकती है क्योंकि झामुमो को टिकट नहीं दिया गया और नाराज झामुमो ने इसका खुला एलान भी किया है। अब यदि झारखंड सरकार से राजद और कांग्रेस के मंत्रियों को हेमंत सोरेन हटा दें तो नई राजनीतिक समीकरण का जन्म हो सकता है।

ऐसा इसलिए भी है क्योंकि हेमंत अथवा दूसरे भी अच्छी तरह जानते हैं कि ईडी और सीबीआई का हमला किन कारणों से हो रहा है। एक बार भाजपा के खेमे में चले गये तो तुरंत ही वाशिंग मशीन से पूरी तरह साफ हो जाएंगे। देख नहीं रहे हैं कि बिहार में सृजन घोटाला भी था, इसकी अब कोई चर्चा भी नहीं होती। वरना पहले तो ऐसा लग रहा था कि मानों नीतीश कुमार के करीबी अफसर भी जल्द गिरफ्तार होने वाले हैं। मामला अब ठंडे बस्ते में है।

इसी बात पर अपने जन्म से पहले बनी फिल्म आर पार का एक गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था मजरूह सुलतानपुरी ने और संगीत में ढाला था ओपी नैय्यर ने। इसे गीता दत्त ने अपना स्वर प्रदान किया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

बाबूजी धीरे चलना
प्यार में ज़रा सम्भलना
हाँ बड़े धोखे हैं
बड़े धोखे हैं इस राह में
बाबूजी धीरे चलना
प्यार में ज़रा सम्भलना
हाँ बड़े धोखे हैं
बड़े धोखे हैं इस राह में
बाबूजी धीरे चलना

क्यूँ हो खोये हुये सर झुकाये
जैसे जाते हो सब कुछ लुटाये
ये तो बाबूजी पहला कदम है
नज़र आते हैं अपने पराये
हाँ बड़े धोखे हैं बड़े धोखे हैं इस राह में
बाबूजी धीरे चलना
प्यार में ज़रा सम्भलना
हाँ बड़े धोखे हैं
बड़े धोखे हैं इस राह में
बाबूजी धीरे चलना

ये मुहब्बत है ओ भोलेभाले
कर न दिल को ग़मों के हवाले
काम उलफ़त का नाज़ुक बहुत है
आके होंठों पे टूटेंगे प्याले
हाँ बड़े धोखे हैं बड़े धोखे हैं इस राह में
बाबूजी धीरे चलना
प्यार में ज़रा सम्भलना
हाँ बड़े धोखे हैं
बड़े धोखे हैं इस राह में
बाबूजी धीरे चलना

हो गयी है किसी से जो अनबन
थाम ले दूसरा कोई दामन
ज़िंदगानी कि राहें अजब हैं
हो अकेला है तो लाखों हैं दुश्मन
हाँ बड़े धोखे हैं बड़े धोखे हैं इस राह में
बाबूजी धीरे चलना
प्यार में ज़रा सम्भलना
हाँ बड़े धोखे हैं
बड़े धोखे हैं इस राह में
बाबूजी धीरे चलना

हां तो बाबूजी, इस राह में कहां, कौन और कब धोखा देगा, यह पूरी तरह राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर है। जिसका जहां दांव चला, वही लंगड़ी मारने को तैयार बैठा है बस कुर्सी की गारंटी होनी चाहिए। कुर्सी के लिए अपुन कुछ भी करेगा की तर्ज पर काम चलता रहता है। इसके बीच ही भाजपा के अंदर अमित शाह के बदले योगी आदित्यनाथ का कद ऊंचा उठ रहा है, इसपर भी अब संदेह करने की कोई गुंजाइश नहीं है। वैसे भी अमित शाह और योगी के रिश्ते अच्छे नहीं हैं, यह कोई गुप्त जानकारी नहीं है। लेकिन अभी तो चुनाव के बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की भी चुनौती है। मोदी से नाराज लोगों ने संजय जोशी का नाम उछालकर पूरी मोदी खेमा को परेशान कर दिया है। अब मोहन भागवत जी और उनकी टीम अंदरखाने से क्या गुल खिलाने वाली है, यह तो वे ही जानें।