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नये किस्म के स्टेनलेस स्टील ने किया वैज्ञानिकों को हैरान, देखें वीडियो

समुद्र के खारा पानी का भी असर नहीं पड़ेगा

  • इसकी आणविक संरचना काफी भिन्न है

  • जंग लगने का लगातार प्रतिरोध करता है

  • सुपर स्टील प्रोजेक्ट का हिस्सा है यह भी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः हांगकांग विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने स्टेनलेस स्टील के क्षेत्र में एक ऐसी क्रांतिकारी खोज की है जो ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन में आने वाली सबसे बड़ी बाधाओं में से एक को दूर कर सकती है। यह तकनीक समुद्री जल से हाइड्रोजन बनाने वाले इलेक्ट्रोलाइज़र को इतना मजबूत बना सकती है कि वे खारे पानी की मार झेल सकें और इतने सस्ते हों कि उनका बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा सके।

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एचकेयू के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर मिंगक्सिन हुआंग के नेतृत्व में टीम ने हाइड्रोजन उत्पादन के लिए एक विशेष स्टेनलेस स्टील (एसएस-एच2) विकसित किया है। यह पदार्थ उन परिस्थितियों में भी जंग का प्रतिरोध करता है जहाँ सामान्य स्टेनलेस स्टील दम तोड़ देता है। यह खोज मटेरियल्स टुडे पत्रिका में प्रकाशित हुई है, जो प्रोफेसर हुआंग के लंबे समय से चल रहे सुपर स्टील प्रोजेक्ट का हिस्सा है। इसी प्रोजेक्ट के तहत पहले एंटी-कोविड स्टेनलेस स्टील और अत्यधिक मजबूत सुपर स्टील विकसित किए जा चुके हैं।

ग्रीन हाइड्रोजन के लिए एक किफायती रास्ता आमतौर पर ग्रीन हाइड्रोजन बनाने के लिए बिजली का उपयोग कर पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ा जाता है। समुद्री जल इसका एक बेहतरीन स्रोत हो सकता है क्योंकि यह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, लेकिन इसमें मौजूद नमक और क्लोराइड आयन इलेक्ट्रोलाइज़र के उपकरणों को तेजी से खराब कर देते हैं। वर्तमान में इसके लिए टाइटेनियम जैसे महंगे पदार्थों का उपयोग किया जाता है जिन पर सोना या प्लैटिनम जैसी कीमती धातुओं की परत चढ़ाई जाती है।

एचकेयू की टीम ने पाया कि नया एसएस-एच2 स्टील, टाइटेनियम आधारित महंगी सामग्रियों के बराबर प्रदर्शन करता है, लेकिन इसकी लागत बहुत कम है। अनुमान के मुताबिक, अगर 10 मेगावाट के इलेक्ट्रोलाइज़र सिस्टम में संरचनात्मक सामग्रियों को एसएस-एच2 से बदल दिया जाए, तो सामग्री की लागत लगभग 40 गुना तक कम हो सकती है।

सामान्य स्टेनलेस स्टील में क्रोमियम जंग से सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन उच्च वोल्टेज पर यह सुरक्षा कवच टूट जाता है। एचकेयू टीम ने सिक्वेंशियल डुअल-पैसिवेशन नामक रणनीति अपनाई है। इसमें स्टील पर दो सुरक्षा परतें बनती हैं। पहली परत क्रोमियम की होती है और दूसरी परत मैंगनीज आधारित होती है, जो उच्च वोल्टेज पर भी स्टील को सुरक्षित रखती है। यह खोज इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि अब तक विज्ञान में यह माना जाता था कि मैंगनीज स्टील की जंग प्रतिरोधक क्षमता को कम करता है।

इस खोज को वास्तविकता में बदलने में टीम को छह साल का समय लगा। अब यह तकनीक प्रयोगशाला से निकलकर औद्योगिक उत्पादन की ओर बढ़ रही है। चीन की एक फैक्ट्री के साथ मिलकर कई टन एसएस-एच2 आरित तार का उत्पादन किया जा चुका है। हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि प्रयोगशाला के माल को वास्तविक औद्योगिक उत्पादों (जैसे मेश और फोम) में बदलना अभी भी एक चुनौती है, लेकिन यह खोज स्वच्छ ऊर्जा के भविष्य की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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