भारतीय नौसेना और वैज्ञानिकों की चौबीस घंटे निगरानी
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नौसेना ने इसका वीडियो जारी किया है
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इस द्वीप पर सिर्फ जानवर और पक्षी हैं
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ज्वालामुखी पदार्थ से ही बना है यह द्वीप
राष्ट्रीय खबर
चेन्नईः भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी, बैरन द्वीप एक बार फिर खबरों में है। अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में स्थित इस दूरस्थ निर्जन द्वीप पर 13 और 20 सितंबर को दो हल्के विस्फोट दर्ज किए गए। ये घटनाएँ भारतीय उपमहाद्वीप के भूवैज्ञानिक परिदृश्य की निरंतर सक्रियता को दर्शाती हैं।
भारतीय नौसेना ने इन दुर्लभ पलों को कैद करते हुए इसका वीडियो भी बनाया। अच्छी बात यह है कि ये विस्फोट इतने हल्के थे कि आसपास के इलाकों में किसी भी तरह के जान-माल के नुकसान का कोई खतरा नहीं है। हालांकि, इन भूगर्भीय हलचलों का परिणाम यह रहा कि निकटवर्ती अंडमान क्षेत्र में 4.2 तीव्रता का भूकंप भी महसूस किया गया। इसके बाद से नौसेना और वैज्ञानिक इस पर लगातार नजर रख रहे हैं।
बैरन द्वीप की भौगोलिक संरचना इसे खास बनाती है। यह बंगाल की खाड़ी में, अंडमान सागर के बीचों-बीच स्थित है और यह पूरा द्वीप ज्वालामुखी पदार्थों से ही निर्मित है। पोर्ट ब्लेयर से लगभग 140 किलोमीटर पूर्व में स्थित यह द्वीप पूरी तरह से निर्जन है, जहाँ इंसानों की आवाजाही न के बराबर है, सिर्फ कुछ जंगली जानवर और पक्षी ही यहाँ पाए जाते हैं।
भूगर्भीय कारण और ज्वालामुखी की प्रकृति
इस ज्वालामुखी के सक्रिय होने के पीछे मुख्य कारण टेक्टॉनिक प्लेटों का टकराव है। बैरन द्वीप सबडक्शन ज़ोन पर स्थित है, जहाँ इंडियन प्लेट धीरे-धीरे बर्मा प्लेट के नीचे धंस रही है। इस टकराव और प्लेटों के घर्षण से अत्यधिक दबाव और गर्मी पैदा होती है, जो पिघले हुए मैग्मा को सतह तक आने का मौका देती है। द्वीप की ऊँचाई समुद्र तल से लगभग 354 मीटर है।
नवीनतम विस्फोट स्ट्रॉम्बोलियन प्रकार के थे, जिन्हें भूविज्ञानी हल्का लेकिन लगातार विस्फोट मानते हैं। इन घटनाओं में मुख्य रूप से धुआँ और राख का गुबार निकला, जिसका गुबार ज्यादा ऊँचाई तक नहीं गया। इन गतिविधियों की गंभीरता इतनी कम थी कि डार्विन वोल्कैनो एंड एश एडवाइजरी सेंटर (वीएएसी) ने भी पुष्टि की है कि ये विस्फोट हवाई यातायात या आसपास के अन्य द्वीपों पर किसी भी तरह का कोई नकारात्मक असर नहीं डाल पाए। वीएएसी ने इससे पहले जुलाई 2025 के अंत से अगस्त की शुरुआत (30 जुलाई से 5 अगस्त) तक भी राख के गुबारों को रिकॉर्ड किया था।
बैरन द्वीप का ज्वालामुखी गतिविधि का इतिहास काफी पुराना है। इसे पहली बार 1789 में सक्रिय दर्ज किया गया था। तब से यह रुक-रुक कर सक्रिय होता रहा है। सबसे महत्वपूर्ण विस्फोटों में से एक 1991 में हुआ था, जो काफी बड़ा था और जिसके परिणामस्वरूप लावा दूर तक बहा था। इसके बाद यह 2017 और 2018 में भी सक्रिय रहा। यह द्वीप भारतीय वैज्ञानिकों के लिए रिसर्च का एक बड़ा केंद्र है। इसकी निरंतर सक्रियता शोधकर्ताओं को पृथ्वी के आंतरिक भाग की प्रक्रियाओं, प्लेट टेक्टॉनिक्स और ज्वालामुखी विज्ञान को समझने में अमूल्य डेटा प्रदान करती है। बैरन द्वीप की यह ताज़ा हलचल हमें याद दिलाती है कि हम एक गतिशील ग्रह पर रह रहे हैं, जहाँ भूगर्भीय प्रक्रियाएँ लगातार जारी रहती हैं।