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नासा के पार्कर सोलर प्रोब ने रचा नया इतिहास

अंतरिक्ष अनुसंधान में एक नया मील का पत्थर बना यान

  • अकल्पनीय गति और दूरी तय

  • अंतरिक्ष की चुनौतियों का सामना

  • सौर तूफानों पर भी जारी है यह शोध

राष्ट्रीय खबर

रांचीः मानवता के साहस और विज्ञान की पराकाष्ठा का एक नया उदाहरण पेश करते हुए, नासा के पार्कर सोलर प्रोब ने 11 मार्च 2026 को सूर्य के बेहद करीब अपनी 27वीं सफल उड़ान पूरी की। इस ऐतिहासिक मिशन ने न केवल अंतरिक्ष विज्ञान के पुराने कीर्तिमानों को ध्वस्त किया है, बल्कि सूर्य के अनसुलझे रहस्यों को समझने की दिशा में एक बड़ी छलांग लगाई है।

इस मिशन के दौरान पार्कर सोलर प्रोब सूर्य की दहकती सतह (फोटोस्फीयर) से मात्र 62 लाख किलोमीटर की दूरी तक पहुँच गया। अंतरिक्ष के संदर्भ में यह दूरी इतनी कम है कि इसे सूर्य को छूने के समान माना जाता है। इस दौरान यान की गति लगभग 6,92,000 किलोमीटर प्रति घंटा दर्ज की गई। इस अविश्वसनीय गति का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस रफ़्तार से कोई विमान मुंबई से दिल्ली की दूरी मात्र 4 सेकंड में और पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी मात्र 40 मिनट में तय कर सकता है।

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1400 डिग्री की गर्मीसूर्य के इतने करीब होने के कारण यान को लगभग 1400 डिग्री सेल्सियस के भीषण तापमान का सामना करना पड़ा। इस अत्यधिक गर्मी से संवेदनशील उपकरणों को बचाने के लिए नासा ने एक विशेष कार्बन-कंपोजिट हीट शील्ड का उपयोग किया है, जिसकी मोटाई 4.5 इंच है। यह शील्ड यान के भीतर के उपकरणों को कमरे के सामान्य तापमान (लगभग 30 डिग्री सेल्सियस) पर सुरक्षित रखती है, जबकि बाहर नरक जैसी गर्मी होती है।

पार्कर सोलर प्रोब का प्राथमिक लक्ष्य सूर्य के बाहरी वातावरण, जिसे कोरोना कहा जाता है, का अध्ययन करना है। वैज्ञानिकों के लिए दशकों से यह एक पहेली रही है कि सूर्य की सतह का तापमान केवल 5,500 डिग्री सेल्सियस है, जबकि उसके बाहरी वातावरण (कोरोना) का तापमान लाखों डिग्री तक पहुँच जाता है।

इसके अलावा, यह यान सौर हवाओं की उत्पत्ति और उनके त्वरण की प्रक्रिया की जांच कर रहा है, जो पृथ्वी पर मौजूद संचार प्रणालियों और सैटेलाइट्स को प्रभावित कर सकती हैं। इस सफलता ने भविष्य के सौर मिशनों के लिए नए द्वार खोल दिए हैं। प्राप्त डेटा से न केवल हमें अपने तारे (सूर्य) को समझने में मदद मिलेगी, बल्कि यह अन्य तारों के व्यवहार और सौर मंडल की कार्यप्रणाली पर भी नई रोशनी डालेगा। 2026 के अंत तक इस प्रोब से और भी करीब जाने की उम्मीद है, जो विज्ञान की दुनिया में एक नया मील का पत्थर होगा।

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