चंदे का गुजराती गोरखधंधा
हाल ही में, गुजरात में कुछ अज्ञात राजनीतिक दलों को 43 सौ करोड़ रुपये के भारी-भरकम चंदे मिलने का मामला सामने आया है। इस घटना ने देश की राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस पर सवाल उठाते हुए इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया है, जबकि चुनाव आयोग की चुप्पी पर भी सवाल उठ रहे हैं।
यह मामला अत्यंत गंभीर है। 43 सौ करोड़ रुपये की राशि कोई छोटी-मोटी रकम नहीं है। यह जानना बेहद जरूरी है कि ये चंदे किन लोगों या संस्थाओं ने दिए हैं और इन अज्ञात दलों का उद्देश्य क्या है? इस तरह के अज्ञात चंदे, चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता की कमी को उजागर करते हैं। यह लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा है क्योंकि यह गुप्त स्रोतों से आने वाले धन के माध्यम से चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
राहुल गांधी का यह कहना सही है कि इस तरह के अज्ञात चंदे लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर हमला हैं। चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता की कमी से राजनीतिक दल और उम्मीदवार अपने समर्थकों के प्रति जवाबदेह नहीं रह पाते। इस तरह की फंडिंग, ब्लैक मनी को चुनावी प्रक्रिया में लाने का एक जरिया भी बन सकती है, जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है।
यह विवाद एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की एक रिपोर्ट पर आधारित है। रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात में 10 अज्ञात राजनीतिक दलों को पाँच साल की अवधि में कुल 4300 करोड़ रुपये का चंदा मिला है। खास बात यह है कि इन पार्टियों ने चुनावी गतिविधियों में बहुत कम हिस्सा लिया और उन्हें बहुत कम वोट मिले।
इस विरोधाभास को गहराई से समझने के लिए एक ठोस आधार स्थापित किया है। इस मामले के मुख्य विरोधाभासों का विश्लेषण भी किया जा सकता है। इन पार्टियों ने चुनाव आयोग को दी गई अपनी रिपोर्ट में चुनावी खर्च 39 लाख रुपये बताया है, जबकि उनकी ऑडिट रिपोर्ट में यह खर्च 3500 करोड़ रुपये दिखाया गया है।
यह एक बड़ा अंतर है जो धन के स्रोत और उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े करता है। मुझे यह भी पता चला है कि राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग की निष्क्रियता पर सवाल उठाए हैं। इस मुद्दे पर चुनाव आयोग की चुप्पी भी चिंताजनक है। चुनाव आयोग, देश में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार है।
इस तरह के गंभीर मामले में आयोग का निष्क्रिय रहना, उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है। देश इससे पहले ही इलेक्ट्रोरल बॉंड का खेल देख चुके हैं। इसमें भारतीय स्टेट बैंक ने पहले जानकारी देने से इंकार किया था और दलील दी थी कि यह सारे चुनावी बॉंड गोपनीय है। बाद में सूचनाधिकार कार्यकर्ता ने बैंक की पोल पट्टी खोल दी थी और बताया था कि हर बॉंड में अदृश्य नंबर अंकित हैं, जिन्हें विशेष रोशनी में देखा जा सकता है।
शीर्ष अदालत के कड़े निर्देश के बाद जब राज खुला तो किस संस्था अथवा कंपनी ने किस राजनीतिक दल को कितना चंदा दिया था, इसकी जानकारी सामने आ गयी। जिससे यह आरोप मजबूत हुआ कि चंदा दो और धंधो लो का कारोबार चल रहा है। इसलिए चुनाव आयोग को इस मामले की तुरंत जांच करनी चाहिए और चंदा देने वालों के बारे में जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।
इस तरह के मामलों को रोकने के लिए, चुनावी फंडिंग में सुधार करना बहुत जरूरी है। देश का सारा काम काज जनता के पैसे से ही चलता है और जनता के प्रति जिम्मेदारी से भागना आखिर कौन सा देशप्रेम है। जो पैसा दे रहे हैं, उन्हें यह जानने का अधिकार स्वतः प्राप्त है कि उनके पैसे का सरकार आखिर क्या कर रही है।
सिर्फ चंद लोगों के ऐशो आराम के लिए तो जनता की कड़ी मेहनत का पैसा यूं ही नहीं लुटाया जा सकता है।राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं, जैसे कि 20,000 रुपये से अधिक के सभी चंदे का खुलासा करना, चुनावी बॉन्ड योजना को खत्म करना और राजनीतिक दलों के ऑडिट को सार्वजनिक करना।
यह मामला केवल गुजरात तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश की चुनावी प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है। यह जरूरी है कि इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया जाए और चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता लाने के लिए सख्त कानून बनाए जाएं। तभी हम एक मजबूत और स्वस्थ लोकतंत्र की नींव रख सकते हैं।
वोट चोरी के आरोप के बीच बदलते माहौल में जो कोई भी इस सच के रास्ते आड़े आयेगा, उसे फिर जनरोष का सामना करना पड़ेगा। वैसे जनता किस तरीके से नाराज हो रही है, वह हम बिहार के दो मंत्रियों को जनता द्वारा खदेड़े जाने से देख रहे हैं। इसलिए सच जल्द सामने आ जाए, यही बेहतर होगा।