यूक्रेन के युद्ध पर पूरी तरह अडिग है ब्लादिमीर पुतिन
मॉस्कोः रूस और यूक्रेन के बीच जारी भीषण युद्ध ने न केवल यूक्रेन को तबाह कर दिया है, बल्कि इसने रूस के भीतर भी गंभीर चुनौतियाँ पैदा कर दी हैं। मॉस्को भले ही यूक्रेन के खिलाफ अपने सैन्य अभियान में जुटा हुआ है, लेकिन इस युद्ध की तपिश ने रूसी अर्थव्यवस्था और श्रम बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है।
सूत्रों के अनुसार, रूस के विभिन्न हिस्सों में एक गंभीर श्रम संकट पैदा हो गया है, जिससे देश की फैक्ट्रियों और निर्माण कंपनियों को भारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इस गतिरोध को दूर करने के लिए, पुतिन सरकार कथित तौर पर भारत से 10 लाख कामगारों को नियुक्त करने की योजना बना रही है।
इस संबंध में, रूसी संगठन यूराल चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के प्रमुख आंद्रेई बेसेदिन ने एक चौंकाने वाला दावा किया है। उन्होंने कहा, जहाँ तक मुझे पता है, इस साल भारत से कुल 10 लाख कामगारों को नियुक्त किया जाएगा। क्योंकि, देश के विभिन्न हिस्सों में श्रम संकट है। कुशल कामगारों की कमी के कारण फैक्ट्रियों और निर्माण कंपनियों को विशेष रूप से समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
बेसेदिन ने यह भी बताया कि केवल भारत से ही नहीं, बल्कि श्रीलंका और उत्तर कोरिया से भी कामगारों को नियुक्त करने की योजना है। यह बयान रूस के भीतर व्याप्त श्रम कमी की गंभीरता को उजागर करता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ कुशल श्रमिकों की अत्यधिक आवश्यकता है।
हालांकि, रूसी श्रम मंत्रालय ने इस दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि उनकी ऐसी कोई योजना नहीं है। यह विरोधाभासी बयान स्थिति को और भी जटिल बना देता है। एक तरफ, उद्योगों में कमी का सामना कर रही हैं, और दूसरी तरफ, सरकार इस तरह की बड़ी भर्ती की खबरों का खंडन कर रही है।
दरअसल, यूक्रेन के साथ युद्ध शुरू होने के बाद, देश के युवाओं का एक बड़ा हिस्सा सेना में शामिल हो गया है। इस सैन्य लामबंदी के परिणामस्वरूप, रूस के उद्योग और उत्पादन क्षेत्रों में श्रमिकों की भारी कमी हो गई है। यह एक दोहरा झटका है: एक तरफ युद्ध चल रहा है, जो संसाधनों और जनशक्ति को खींच रहा है, और दूसरी तरफ, यदि यह श्रम की कमी दिन-ब-दिन बढ़ती रही, तो देश की अर्थव्यवस्था को और भी गंभीर नुकसान होगा। मॉस्को ने इस तरह की स्थिति को रोकने के लिए पहले से ही उपाय करने शुरू कर दिए हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि वे कौन से विशिष्ट उपाय हैं और वे कितनी प्रभावी होंगे।
रूस के इस श्रम संकट का भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह देखना बाकी है। यदि बेसेदिन का दावा सही साबित होता है और रूस वास्तव में भारत से इतने बड़े पैमाने पर कामगारों को नियुक्त करता है, तो यह भारतीय श्रमिकों के लिए रोज़गार के बड़े अवसर पैदा कर सकता है। हालांकि, रूसी श्रम मंत्रालय के खंडन के बाद, इस पर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है। यह स्थिति रूस की आंतरिक चुनौतियों और युद्ध के दीर्घकालिक आर्थिक प्रभावों को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।