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800 करोड़ रुपये की परियोजना धोखाधड़ी का मामला

सीबीआई ने टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स और अन्य पर शिकंजा कसा

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने एक बड़े भ्रष्टाचार मामले का खुलासा किया है जिसमें जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (जेएनपीटी) और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स लिमिटेड सहित कई संस्थाएं और व्यक्ति शामिल हैं। यह मामला लगभग ₹800 करोड़ की कथित धोखाधड़ी से संबंधित है, जिसमें अनुबंधों में हेराफेरी कर सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचाया गया। सीबीआई ने टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स लिमिटेड के परियोजना निदेशक, जेएनपीटी के मुख्य प्रबंधक और अन्य के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया है।

सीबीआई की प्रारंभिक जांच के बाद यह शिकायत दर्ज की गई, जिसमें जेएनपीटी के बंदरगाह अधिकारियों और संबंधित निजी कंपनियों के बीच मिलीभगत के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों में बढ़ा-चढ़ाकर अनुमान तैयार करना, अंतरराष्ट्रीय बोलीदाताओं को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए प्रतिस्पर्धा को सीमित करना, और ठेकेदार को फायदा पहुंचाना शामिल है। इसके अतिरिक्त, स्वतंत्र विशेषज्ञों और संगठनों की महत्वपूर्ण रिपोर्टों को दबाने का भी आरोप है, जिससे पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।

जांच में यह भी सामने आया है कि जेएनपीटी अधिकारियों द्वारा अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग किया गया, जिसके परिणामस्वरूप निजी कंपनियों को अनुचित आर्थिक लाभ मिला। यह घोटाला दो चरणों में फैला हुआ है। पहले चरण में, जो 2003 से 2014 तक चला, और दूसरे चरण में, जो 2013 से 2019 तक चला, सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ।

सीबीआई के अनुसार, जांच के दौरान जेएनपीटी अधिकारियों और अन्य निजी व्यक्तियों के बीच एक आपराधिक साजिश का पता चला, जिसके कारण ओवरड्रेजिंग हुई। इस ओवरड्रेजिंग के कारण चरण-1 परियोजना में 365.90 करोड़ और चरण-2 परियोजना में 438 करोड़ रुपये का गलत नुकसान हुआ।

इस मामले में जिन प्रमुख आरोपियों के नाम सामने आए हैं, वे हैं: सुनील कुमार मदभवी, जो उस समय जेएनपीटी के मुख्य प्रबंधक (पीपी एंड डी) थे; देवदत्त बोस, जो मुंबई में टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स के वरिष्ठ महाप्रबंधक थे; बोसकालिसस्मिट इंडिया एलएलपी; और जान दे नुल ड्रेजिंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड। इनके अलावा, कुछ अज्ञात लोक सेवक और निजी व्यक्ति भी इस साजिश में शामिल बताए जा रहे हैं, जिनकी जांच अभी जारी है।

यह मामला सरकारी परियोजनाओं में भ्रष्टाचार के खतरे को उजागर करता है और दिखाता है कि कैसे कुछ अधिकारी और निजी संस्थाएं मिलकर सार्वजनिक धन का दुरुपयोग कर सकते हैं। सीबीआई की इस कार्रवाई से उम्मीद है कि इस बड़े घोटाले के पीछे के सभी दोषियों को बेनकाब किया जाएगा और उन्हें न्याय के कटघरे में लाया जाएगा।