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स्वास्थ्य बीमा प्रणाली से दस हजार करोड़ नुकसान

एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के आंकड़ों के विश्लेषण से गड़बड़ी पकड़ाया

  • दो कंपनियों ने किया यह सर्वेक्षण

  • धोखाधड़ी वाले क्लेम में मिलीभगत

  • ग्रुप प्रतिपूर्ति में नौ गुणा फर्जीवाड़ा

राष्ट्रीय खबर

बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप और मेडी असिस्ट द्वारा जारी एक हालिया रिपोर्ट ने भारत के स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र के सामने खड़ी एक बड़ी चुनौती को उजागर किया है: धोखाधड़ी और बर्बादी रिपोर्ट के अनुसार, इन अनियमितताओं के कारण भारतीय स्वास्थ्य बीमा उद्योग को हर साल क्लेम भुगतान में लगभग ₹8,000 से ₹10,000 करोड़ का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

इस अध्ययन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि धोखाधड़ी और अनावश्यक क्लेम की यह प्रवृत्ति न केवल पॉलिसीधारकों के लिए बीमा प्रीमियम को बढ़ाती है, बल्कि बीमाकर्ताओं की वित्तीय स्थिरता को भी गंभीर रूप से प्रभावित करती है। यह विशेष रूप से भारत जैसे बढ़ते बाजार के लिए चिंताजनक है जहाँ स्वास्थ्य बीमा की पहुँच लगातार बढ़ रही है।

रिपोर्ट के विश्लेषण के अनुसार, खुदरा स्वास्थ्य योजनाएं विशेष रूप से धोखाधड़ी के प्रति अधिक संवेदनशील पाई गई हैं। धोखाधड़ी का सबसे बड़ा जोखिम प्रतिपूर्ति क्लेम से उत्पन्न होता है। शोध में पाया गया कि, ग्रुप प्रतिपूर्ति क्लेम में ग्रुप कैशलेस क्लेम की तुलना में नौ गुना अधिक धोखाधड़ी पाई गई।

व्यक्तिगत प्रतिपूर्ति क्लेम में तो ग्रुप कैशलेस योजनाओं की तुलना में आश्चर्यजनक रूप से 20 गुना अधिक धोखाधड़ी पाई गई। यह आँकड़ा बताता है कि कैशलेस प्रणाली की तुलना में प्रतिपूर्ति प्रक्रिया में निगरानी और सत्यापन की कमी का लाभ उठाया जा रहा है। धोखाधड़ी के सबसे आम रूपों में गलत बयानी और दस्तावेज़ों का फर्जीवाड़ा शामिल हैं, जैसे कि नकली बिल, झूठे निदान या अनावश्यक प्रक्रियाओं के लिए क्लेम करना।

दिलचस्प बात यह है कि धोखाधड़ी की प्रवृत्ति 50,000 से 2.5 लाख रुपये तक के मध्य-श्रेणी के क्लेम में अधिक होती है। रिपोर्ट बताती है कि इस सीमा में, धोखाधड़ी करने का प्रोत्साहन महत्वपूर्ण होता है, लेकिन बीमा कंपनियों की निगरानी अपेक्षाकृत मध्यम बनी रहती है, जिससे धोखाधड़ी करने वालों को इसका फायदा उठाने का अवसर मिल जाता है।

इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए, रिपोर्ट ने कई महत्वपूर्ण और व्यापक उपायों की सिफारिश की है। सख्त रोकथाम और पहचान के उपाय: धोखाधड़ी की रोकथाम और पहचान के लिए कड़ी नीतियां और प्रक्रियाओं को लागू करना। मानकीकृत मेडिकल कोडिंग नियम: क्लेम की सटीकता और सत्यापन को बढ़ाने के लिए मेडिकल कोडिंग नियमों का मानकीकरण करना।

धोखाधड़ी के पैटर्न को तेजी से पहचानने और संदिग्ध क्लेम को फ्लैग करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग का उपयोग करना। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन जैसी सरकारी पहलों के माध्यम से बीमाकर्ताओं, अस्पतालों और नियामक निकायों के बीच डेटा-साझाकरण को बढ़ाना। इन सिफारिशों को लागू करने से भारत के स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र में पारदर्शिता आ सकती है और ईमानदार पॉलिसीधारकों पर अनावश्यक प्रीमियम बोझ को कम किया जा सकता है।