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विनय चौबे की खास मुलाकात ही परेशानी का सबब

दिल्ली जाने वाले हर अफसर पर सरकार की कड़ी नजर

  • डीजीपी आवास लेना भी महंगा पड़ा

  • दिल्ली से मिलने की रिपोर्ट आ गयी थी

  • सुदेश के मेलजोल की जानकारी भी आम हुई

राष्ट्रीय खबर

रांचीः झारखंड से दिल्ली जाने वाले अफसर भी अब सतर्क हो गये हैं। दरअसल खास तौर पर आईएएस अफसरों का दिल्ली आना जाना कोई बड़ी बात नहीं थी। कई बार तो अफसरों के पारिवारिक कार्यक्रमों के दौरान भी सरकारी मीटिंग का आयोजन हो जाता था और उसी मीटिंग के बहाने लोग समारोह में भी शामिल हो आते थे।

अब माहौल बदल गया है और अंदरखाने से मिली जानकारी के मुताबिक दिल्ली जाने वाले हर आईएएस और आईपीएस पर हेमंत सरकार की खास नजर है। इसके लिए राज्य की विशेष शाखा के लोग अत्यधिक सक्रिय हैं और वहां जाने वाले हर अधिकारी की रिपोर्ट यहां नियमित तौर पर दाखिल की जा रही है। समझा जाता है कि इसी नजरदारी की वजह से विनय चौबे भी अचानक से हिट लिस्ट में आ गये। उन्होंने दिल्ली में कुछ खास लोगों से मिलने के बाद शायद किसी सरकारी जांच एजेंसी से भी संपर्क किया था। जिसकी भनक मिलने के बाद सरकार ने अपनी मशीनरी को सक्रिय कर दिया।

वैसे जानकार बताते हैं कि कभी हेमंत सोरेन के पर्याय बन चुके विनय चौबे दरअसल सीएम आवास के करीब डीजीपी आवास में जाने की वजह से भी संदेह के घेरे में आ गये थे। पुलिस कोटा के इस भवन में उनके जाने को आईपीएस कैडर ने भी अच्छी नजरों से नहीं देखा था। दूसरी तरफ इसी आवास में रहते हुए अपने पड़ोसी सुदेश महतो से उनकी मुलाकात की भनक भी दूसरे छोर पर बने सीएम आवास के लोगों को हो चुकी थी। लोग मानते हैं कि विधानसभा चुनाव से पहले वह दो नावों की सवारी करना चाहते थे। हेमंत सोरेन के करीबी होने के साथ साथ वह सुदेश महतो से अपनी नजदीकी इसलिए बढ़ा रहे थे ताकि अगर चुनाव परिणाम उल्टा आये तो सुदेश की मदद से वह राजग सरकार में भी अपनी पैठ बनाये रख सकें।

कानफूकवा लोगों ने इसकी जानकारी हेमंत सोरेन तक पहुंचा दी और अचानक से हेमंत सोरेन के कार्यक्रमों से विनय चौबे गायब हो गये। कभी हर सरकारी कार्यक्रम में नजर आने वाले विनय चौबे के सीन से गायब होने की आईएएस लॉबी अच्छी तरह समझ गया था। दूसरी तरफ अपनी पसंद के अफसरों को मनचाही पोस्टिंग दिलाने के कारण भी वह अफसरों के बीच अलोकप्रिय हो गये थे। इस मामले में उन्होंने राजबाला वर्मा का रास्ता अपनाया था, जो अपनी बातों से ही अपने पसंदीदा अफसरों को आगे बढ़ाने तथा नापसंद लोगों को अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी।

वैसे जानकार यह देखने को अधिक उत्सुक हैं कि शराब घोटाले की जांच की गाड़ी कहां तक पहुंचती है। दरअसल यह खेल रघुवर दास के शासनकाल में जिस अफसर ने प्रारंभ किया था, वह अब तक जांच के दायरे से बाहर ही है। लेकिन जानकार मानते हैं कि अगर परिस्थितियां बदली तो दूसरे बड़े अफसर भी इसी जांच में नप जाएंगे।