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कुलपतियों की नियुक्ति में टाल मटोल पर सवाल खड़े

उच्च शिक्षा जगत में अलोकप्रिय हो गया झारखंड का राजभवन

  • प्रभारी कुलपतियों के भरोसे शिक्षा व्यवस्था

  • वर्ष 2008 के बाद से प्रोन्नति नहीं हुई है

  • दुकानदारी का रेट भी अब चर्चा में आया

रजत कुमार गुप्ता

रांचीः झारखंड का राजभवन भी पहली बार उच्च शिक्षा संबंधी मुद्दों में विवादों के केंद्र में आ गया है। दरअसल इसकी चर्चा पहले ही होने लगी थी पर अब कुलपतियों की नियुक्ति में हो रही देर ने कई नये सवाल खड़े कर दिये है। इन पदों के लिए विशेषज्ञों की एक कमेटी भी बनायी गयी थी। इस सर्च कमेटी के बनने के बाद इस कमेटी ने कोई पहल तक नहीं की है। इसके बाद भी प्रभारी कुलपति अथवा दो विश्वविद्यालयों में एक ही कुलपति के मसले ने शिक्षाविदों के कान खड़े कर दिये हैं।

मामले की छानबीन में अजीब बात यह सामने आयी कि वर्ष 2008 में नियुक्त शिक्षकों को इतने दिनों में प्रोन्नति भी नहीं मिली है। जिसका नतीजा है कि अनेक विभागाध्यक्ष भी प्रभार में चल रहे हैं क्योंकि वे नियम के मुताबिक शर्तों को पूरा नहीं करते। दूसरी तरफ इन प्रोफेसरों को प्रोन्नति क्यों नहीं मिली का उत्तर उच्च शिक्षा विभाग की फाइलों में उलझकर कहीं खो गया है।

दूसरी तरफ राजभवन पर सवाल खड़े होने की जांच में पता चला कि अधिकांश विश्वविद्यालयों के तमाम बड़े पदों पर प्रभारी ही काम कर रहे हैं। शिक्षाविदों का आरोप है कि ऐसे प्रभारियों को अपने तरीके से नियंत्रित करना राजभवन के लिए आसान होता है। दूसरी तरफ राजनीतिक कारणों से झारखंड सरकार भी इस पर पूरा ध्यान नहीं दे पायी है। इसका नतीजा है कि कुलाधिपति कार्यालय के प्रधान सचिव नितिन मदन कुलकर्णी ही इन तमाम विश्वविद्यालयों के सबसे ताकतवर व्यक्ति बन बैठे हैं। शिकायत यह भी मिली है कि राजभवन का एक डिप्टी सेक्रेटरी भी तमाम विश्वविद्यालयों को फोन पर निर्देश जारी करता है और पदों पर बैठे लोग मजबूरी में इन आदेशों का पालन करते हैं।

मामले की जानकारी रखने वालों ने इसके लिए राज्यपाल संतोष गंगवार को भी जिम्मेदार ठहराया है, जो सरकारी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के बदले निजी विश्वविद्यालयों के कार्यक्रम में शामिल होने को प्राथमिकता देते हैं। सूत्रों ने इसके बारे में कई उदाहरण भी गिना दिये।

आरोप है कि विश्वविद्यालयों के पदों पर नियुक्ति के नाम पर राजभवन में दुकानदारी होने लगी है। धीरे धीरे पदों का दर भी बढ़ता जा रहा है। इसका नतीजा है कि इनमें पठन पाठन का मूल कार्य बहुत बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। किस पद का टेंडर रेट बढ़ते हुए कहां जा पहुंचा है, यह अब विश्वविद्यालयों में चर्चा का विषय बना हुआ है।