गुटबाजी और राजनीतिक चमचई ने बंटाधार किया
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अपने फायदे से नीचे के अफसरों को शाबासी
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शराब कांड की नींव तो पिछली सरकार में पड़ी
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टेंडर में कितना परसेंट यह भी बताया जाता है
राष्ट्रीय खबर
रांचीः आम तौर पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के प्रति आम आदमी का जो भरोसा होता है, वह झारखंड में काफी नीचे आ चुका है। दरअसल सच्ची बात तो यह है कि सार्वजनिक तौर पर ईमानदारी का बखान करने वाला कौन सा अफसर किस मातहत के तहत घूस लेता है, यह बात सरकार के अलावा सभी को पता होता है।
लिहाजा काम की गुणवत्ता दिनोंदिन कम होने के साथ साथ अफसरों की संपत्ति में ईजाफा होता ही जा रहा है। इस स्थिति पर गौर करें तो इसके लिए पूर्व मुख्य सचिव राजबाला वर्मा के कार्यकाल को सबसे अधिक जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। उनके कार्यकाल में उनकी निजी पसंद के अधिकारियों को अफसरों की बैठक में निरंतर शाबासी देना कई अन्य अच्छे अफसरों को भी इसी रास्ते पर आगे बढ़ने को प्रोत्साहित कर गया।
इसके अलावा राजबाला वर्मा के कार्यकाल में ही अफसरों की एक गिरोहबंदी हो गयी। यह सारे अफसर मिलकर यह तय करते थे कि नीतिगत तौर पर किस मामले को आगे बढ़ाना है और किस मामले को रद्दी की टोकरी में डाल देना है। अब इस गुट में कौन कौन लोग थे, यह भी जगजाहिर बात है।
रघुवर दास के मुख्यमंत्री काल में शराब की सरकारी व्यवस्था किस अफसर की सोच थी, यह भी सरकार के अलावा आम आदमी को पता है। सरकारी व्यवस्था में शराब की बिक्री के लिए बाहर से जो लोग लाये गये, उनका उक्त अधिकारी से क्या रिश्ता था, यह तो शराब बेचने वाली कंपनी के मुलाजिम खुले तौर पर कहा करते थे।
इसी व्यवस्था को आगे बढ़ाते हुए विनय चौबे फिलहाल न्यायिक हिरासत में पहुंच गये। शराब के कारोबार के एकाधिकार में कौन कौन लोग उनके प्रियपात्र हैं तथा किनलोगों को चुप रखने की फीस दी जाती है, यह जानकारी भी विभाग के कनीय संवर्ग के लोगों तक को थी।
लिहाजा यह माना जा सकता है कि तीन आईएएस अफसरों के जेल जाने के बाद यह लगभग तय हो गया है कि जनता तक इस अफसशाही के बारे में जो जानकारियां पहुंचती है, उनका अधिकांश सच ही होता है।
जानकार बताते हैं कि बालू से लेकर कोयला तक की कमाई के तौर तरीके भी अफसर ही नेताओं को बताते हैं। इसी हिसाब से फिर जिला और थाना स्तर पर रेट तय होता है। यह अलग बात है कि इन अवैध कारोबारों को परोक्ष संरक्षण देने के नाम पर अफसर ही असली मलाई खा जाते हैं जबकि नेताओं को बिना किसी परिश्रम के अतिरिक्त आमदनी से संतोष करना पड़ता है।
इस किस्म की कमाई का भी अफसरों के स्थानांतरण और पदस्थापन में महत्व होता है। ऊपर से तमाम किस्म के निर्माण कार्यों में ऊपर तक कितना परसेंट पहुंचता है, यह तो टेंडर जारी करने वाले अधिकारी ही ठेकेदार को विस्तार से समझा देते हैं। लिहाजा विभागीय कार्यसंस्कृति में यह अब आम बात है कि किस काम में कितना बंटवारा होगा, इसी आधार पर काम की प्राथमिकता तय होती है। अगर मामला फंस गया तो अफसरों के पास फाइल में विमर्श करें की टिप्पणी दर्ज कर मामला टालने का हथियार भी है।