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विधि व्यवस्था का बड़ा सवाल बन रहा है चुनाव

प्रत्याशियों के प्रचार में आक्रामक तेवर से बिगड़ता माहौल

  • व्हाट्सएप समूहों में भी तीखा तेवर

  • हर शाम समर्थकों की रात्रि सेवा

  • नारेबाजी का ठेका भी ले रहे लोग

राष्ट्रीय खबर

रांचीः रांची नगर निगम का आगामी चुनाव पिछले कई चुनावों की तुलना में काफी अलग और अधिक जटिल महसूस किया जा रहा है। इस बार राजधानी की गलियों में होने वाला चुनावी शोर केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह आपसी रंजिश साधने और दिखावे की राजनीति का अखाड़ा बन गया है। इस बदलाव ने न केवल चुनाव के सांस्कृतिक और सामाजिक ढांचे को प्रभावित किया है, बल्कि आर्थिक और सुरक्षा के मोर्चे पर भी नई चुनौतियां पेश कर दी हैं।

इस बार के चुनाव में सबसे बड़ा बदलाव आर्थिक मोर्चे पर देखा जा रहा है। पहले के चुनावों में प्रत्याशियों के पास वैचारिक रूप से जुड़े कट्टर समर्थकों की एक फौज होती थी, जो बिना किसी स्वार्थ के प्रचार में जुटती थी। लेकिन इस बार स्थिति इसके विपरीत है। अधिसंख्य प्रत्याशियों के पास अपने भरोसेमंद कार्यकर्ताओं का अभाव है। परिणामस्वरूप, किराये की फौज का चलन बढ़ गया है।

हर सुबह नेताजी के गले में माला डालकर उनके पीछे चलने वाले समर्थकों की भीड़ का एक बड़ा हिस्सा नकद भुगतान पर निर्भर है। यह चुनाव प्रत्याशियों की जेब पर काफी भारी पड़ रहा है, क्योंकि हर शाम इन भाड़े के समर्थकों की ‘खातिरदारी’ और अन्य खर्चों के लिए मोटी रकम खर्च करनी पड़ रही है। बिना वैचारिक जुड़ाव के चलने वाली यह भीड़ केवल आर्थिक लाभ के लिए साथ है, जिससे वास्तविक जनसंपर्क कहीं पीछे छूट गया है।

सबसे चिंताजनक पहलू चुनाव प्रचार के दौरान बिगड़ता माहौल है। अपनी जीत सुनिश्चित करने की होड़ में प्रत्याशी और उनके समर्थक सामाजिक शिष्टाचार की गरिमा को ताक पर रख रहे हैं। प्रतिद्वंद्वी को केवल राजनीतिक रूप से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत रूप से कमतर दिखाने और अपमानित करने की कोशिशें तेज हो गई हैं। रांची के कई वार्डों से ऐसी खबरें आ रही हैं जहाँ समर्थकों के बीच तीखी बहस और व्यक्तिगत छींटाकशी हो रही है। यदि यही उग्र तेवर जारी रहे, तो यह आगे चलकर शहर की विधि-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

नगर निगम के इस चुनाव ने स्थानीय कारोबार को एक नई ऊर्जा दी है। पोस्टर, बैनर, झंडे और फूल-मालाओं का बाजार गर्म है। प्रत्याशियों को अपने क्षेत्र में उपस्थिति दर्ज कराने के लिए इनकी नियमित आवश्यकता होती है, जिससे दैनिक स्तर पर लाखों का कारोबार हो रहा है। हालाँकि, यहाँ भी नकारात्मक राजनीति हावी है। कई इलाकों से शिकायतें मिल रही हैं कि प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशी के बैनर फाड़े जा रहे हैं या उनके पोस्टरों पर कालिख पोती जा रही है। इन हरकतों की वजह से रांची के कुछ संवेदनशील मोहल्लों में तनाव की स्थिति बनी हुई है।

इस भागदौड़ के बीच शहर के बेरोजगार युवाओं के लिए यह चुनाव कमाई का एक जरिया बनकर आया है। किसी भी राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर, युवाओं की कई टोलियां नकद भुगतान के बदले प्रचार करने के लिए उपलब्ध हैं। एक दर्जन की संख्या वाली कई टीमें फिलहाल सक्रिय हैं, जो बारी-बारी से अलग-अलग प्रत्याशियों के लिए काम कर रही हैं। चुनावी भाषा में कहें तो हर दिन कोई न कोई ‘नया मुर्गा’ इन टीमों के जाल में फंस रहा है, जिससे इन युवाओं का काम तो चल निकला है, लेकिन राजनीति की गंभीरता कम होती जा रही है।