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रिम्स में सेंट्रल लैब की स्थापना से आखिर परेशानी किन्हें है

  • स्वास्थ्य मंत्री का एक फैसला हाईकोर्ट ने झटका खा गया

  • मरीजों को एकजगह सुविधा मिलने से किसे नुकसान

  • जांच के भुगतान की असलियत किसी ने जांचा है

गतांक से आगे

मामले की जड़ में रिम्स में एक सेंट्रल लैब की स्थापना का है। दस्तावेज बता रहे हैं कि पिछले तीन वर्षों से यह टेंडर किसी न किसी बहाने रोका जाता रहा है और इसका सीधा लाभ किसे मिलता रहा है, यह समझना आसान है। यह बताना जरूरी है कि रिम्स की स्थिति को आगे ले जाने की अनुशंसा करने वाली राष्ट्रीय टीमों ने कई बार ऐसे जांच की प्रक्रिया रिम्स के अधीन करने की हिदायत दी थी।

इसमें कहा गया था कि खून तथा अन्य तमाम किस्म की जांच की जिम्मेदारी का रिम्स ने आउटसोर्स कर रखा है जबकि आधुनिक मानदंड में इसका नियंत्रण संबंधित संस्था के अधीन होना चाहिए। मामले की छानबीन से पता चला है कि दरअसल इस विधि की शुरुआत दिल्ली के एम्स से की गयी थी। जिसका मकसद बेहतर गुणवत्ता वाली जांच के साथ साथ मरीजों के भटकने की स्थिति को खत्म करना था। देश के कई अन्य चिकित्सा संस्थानों में भी यही नियम अब लागू कर दिया गया है ताकि वहां आने वाले मरीजों को जांच के लिए जहां तहां भटकना ना पड़े।

रिम्स के सेंट्रल लैब का टेंडर गत तीन वर्षों में छह बार किसी न किसी बहाने रद्द किया गया है। जब इसकी वजह की गहराई में जांच हुई तो पता चला कि काफी पहले रिम्स के ट्रॉमा सेंटर में किसी एनजीओ की सिफारिश पर जांच की एक मशीन लगायी गयी थी। मशीन एक विश्वस्तीय कंपनी एबोट की है पर जानकार बताते हैं कि रिम्स में सेकंड हैंड मशीन इस शर्त पर लगायी गयी थी कि जांच में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल का भुगतान रिम्स द्वारा किया जाएगा।

सामान्य स्थिति में यह बेहतर बात प्रतीत होती है पर अंदरखाने से पता चला कि रघुवर दास के शासनकाल में लिये गये इस फैसले के पीछे भाजपा के एक राज्यसभा सांसद का हाथ था।

सूत्रों ने बताया कि सेंट्रल लैब की स्थापना हेतु टेंडर आमंत्रित किये जाने के दौरान इस एक कंपनी ने एक बार भी टेंडर नहीं डाला। इस वजह से सामान्य समझदारी वाले लोगों का ध्यान भी इसकी तरफ गया। बाहर से इसकी जानकारी हासिल करने पर पता चला कि एबोट कंपनी अब तक जांच के नाम पर सामान्य दर से तीन गुणा अधिक राशि वसूल रही है। दूसरी तरफ एक अन्य कंपनी ने आठ गुणा अधिक दर की निरंतर वसूली की है। उच्चस्तरीय टीम की अनुशंसा पर रिम्स में सेंट्रल लैब स्थापित करने की इच्छुक रिम्स के निदेशक के फैसले से नीचे से ऊपर तक अनेक लोगों को नाराज कर दिया, जो जांच के नाम पर होने वाली वसूली के परोक्ष हिस्सेदार बने हुए थे। (जारी)