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वक्फ संशोधन विधेयक भी गरमी बढ़ेगी

संसद में जारी घमासान के बीच ही नई रिपोर्ट मिली

  • जेपीसी को सौंपी गयी थी जिम्मेदारी

  • सुधारों का मुख्य केंद्र और पारदर्शिता

  • विपक्ष की आपत्तियां और संवैधानिक बहस

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः भारतीय संसद का वर्तमान सत्र ऐतिहासिक और प्रशासनिक सुधारों की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील मोड़ पर है। वक्फ संशोधन विधेयक, 2024 को लेकर पिछले कई महीनों से जारी राजनीतिक गतिरोध अब अपने निर्णायक चरण में पहुँच गया है। संयुक्त संसदीय समिति  जिसे इस विधेयक के सूक्ष्म परीक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, अब अपनी विस्तृत रिपोर्ट सदन के पटल पर रखने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस रिपोर्ट के आने के साथ ही यह साफ हो जाएगा कि दशकों पुराने वक्फ अधिनियम में किस स्तर के बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं।

सरकार द्वारा प्रस्तावित इस विधेयक का प्राथमिक उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के विशाल तंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। वर्तमान में, वक्फ बोर्डों के पास संपत्तियों के प्रबंधन के असीमित अधिकार हैं, जिन पर अक्सर कुप्रबंधन के आरोप लगते रहे हैं। सरकार इन संपत्तियों के पंजीकरण को पूरी तरह डिजिटल बनाना चाहती है ताकि भू-अभिलेखों में कोई विसंगति न रहे। इस विधेयक का एक क्रांतिकारी पहलू वक्फ बोर्डों के ढांचे में समावेशिता लाना है; इसके तहत पहली बार मुस्लिम महिलाओं और गैर-मुस्लिम विशेषज्ञों को बोर्ड की सदस्यता में अनिवार्य स्थान देने का प्रावधान किया गया है। सरकार का तर्क है कि इससे बोर्ड की निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक लोकतांत्रिक और न्यायसंगत बनेगी।

दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने इस विधेयक को अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकारों और अनुच्छेद 25-28 के तहत मिलने वाली स्वायत्तता पर हमला करार दिया है। विपक्ष का मुख्य तर्क यह है कि वक्फ एक निजी धार्मिक ट्रस्ट की तरह है और इसमें सरकार का हस्तक्षेप या गैर-मुस्लिमों की भागीदारी इसके मूल धार्मिक स्वरूप को नष्ट कर सकती है। जेपीसी की बैठकों के दौरान भी विपक्षी सांसदों ने कई बार वॉकआउट किया और आरोप लगाया कि हितधारकों की बातों को सही ढंग से नहीं सुना गया। हालांकि, जेपीसी ने स्पष्ट किया है कि उसने देशभर के हजारों धार्मिक संगठनों, कानूनी विशेषज्ञों और आम नागरिकों से लिखित व मौखिक सुझाव प्राप्त किए हैं, जिन्हें रिपोर्ट का आधार बनाया गया है।

संसदीय कार्य मंत्री ने सदन की गरिमा बनाए रखने की अपील करते हुए कहा है कि सरकार हर बिंदु पर स्वस्थ बहस के लिए तैयार है। यदि यह विधेयक पारित होता है, तो यह 1995 के मूल अधिनियम में सबसे व्यापक बदलाव होगा। इस कानून का असर न केवल धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन पर पड़ेगा, बल्कि यह आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भी एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। पूरे देश की निगाहें अब सदन की मेज पर रखी जाने वाली उस रिपोर्ट पर हैं, जो वक्फ बोर्डों के भविष्य की नई पटकथा लिखेगी।