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टकराव की एक और जमीन बनकर तैयार

 

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद युनूस कोई अनपढ़ व्यक्ति नहीं है। वह नोबल पुरस्कार विजेता है और इस लिहाज से माना जा सकता है कि वह जो कुछ भी बोलते हैं, सोच समझकर बोलते हैं।

इसलिए चीन के दौरे में उन्होंने पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों पर जो कुछ कहा है, वह सिर्फ बयानबाजी नहीं हो सकती। दूसरी तरफ त्रिपुरा के राज परिवार के मुखिया और टिपरा मोथा पार्टी के प्रमुख प्रद्योत देववर्मन का बयान भी किसी अनपढ़ की बात नहीं है।

बोआओ फोरम फॉर एशिया सम्मेलन में शिरकत के लिए चीन गये बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस की टिप्पणियों पर भारत में तीखी प्रतिक्रिया हुई है और उनकी अंतर्निहित मंशा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। एक गोलमेज सम्मेलन में बोलते हुए, यूनुस ने पूर्वोत्तर भारतीय राज्यों सेवन सिस्टर्स का जिक्र लैंड-लॉक्ड इलाके के रूप में करते हुए, क्षेत्र में संपर्क और व्यापार के अभाव पर जोर दिया।

भारत की विशाल तटरेखा की अनदेखी करते हुए, उन्होंने दावा कर डाला कि बांग्लादेश महासागर तक पहुंच का संरक्षक है। और, उन्होंने इन भारतीय राज्यों को बाजार व उत्पादन के ठिकाने के रूप में पेश करते हुए, चीन से कहा कि वह भूटान, नेपाल और बांग्लादेश के साथ-साथ इन्हें भी चीनी अर्थव्यवस्था के विस्तार के रूप में देखे।

उनके सोशल मीडिया खातों पर साझा की गयी उनकी टिप्पणियों के अन्य निहितार्थ भी थे। पिछले अगस्त में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता से बेदखली के पश्चात उनके पद संभालने के बाद से यह उनकी चीन की पहली यात्रा थी। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमलों और यूनुस सरकार द्वारा हसीना को स्वदेश भेजने की मांग पर भारत के साथ तनाव बना हुआ है।

नयी दिल्ली की ओर कोई न्योता नहीं मिलने के मद्देनजर, यूनुस के चीन यात्रा के निर्णय को एक कूटनीतिक झिड़की और शायद इस संकेत के रूप में देखा गया है कि बांग्लादेश अपनी विदेश नीति की दिशा बदल रहा है।

विदेश मंत्रालय ने टिप्पणी करने से इनकार किया है, लेकिन राजनीतिक नेता कूद पड़े हैं। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिश्व शर्मा ने इन टिप्पणियों को आपत्तिजनक और घोर निंदनीय करार देते हुए, यह इशारा किया कि इन टिप्पणियों का लक्ष्य चिकेन्स नेक के जरिए भारत की रणनीतिक दुर्बलता की ओर ध्यान खींचना था। अन्य क्षेत्रीय नेताओं और विपक्षी सदस्यों ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वह ढाका के समक्ष अपनी नाखुशी प्रकट करे।

यूनुस इस बात से नावाकिफ नहीं हो सकते हैं कि उनके भाषण का वक्त और जगह विवाद पैदा करेंगे।

उनकी टिप्पणियों में इस बात को लेकर संवेदनशीलता का अभाव झलकता है कि उपरोक्त देश उन बयानों की व्याख्या कैसे करेंगे जो क्षेत्र में चीन के आर्थिक वर्चस्व का समर्थन करते प्रतीत होते हैं।

ये टिप्पणियां अपने मेजबान को लुभाने की नीयत से या क्षेत्रीय संपर्क के लिए पैरोकारी से उपजी हो सकती हैं, लेकिन उनके अर्थ पर ज्यादा सावधानीपूर्वक विचार किया जा सकता था। थाईलैंड में आगामी बिम्सटेक शिखर सम्मेलन ऐसी चर्चाओं के लिए ज्यादा मुनासिब मंच हो सकता था, जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और दक्षिण एशिया से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक के नेता मौजूद रहेंगे।

यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि यूनुस को इस हफ्ते भारत से दो पत्र मिले: एक राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से ईद-उल-फित्र की बधाई देते हुए, और दूसरा, बांग्लादेश के स्वाधीनता दिवस की वर्षगांठ पर मोदी की ओर से। हालांकि मोदी-यूनुस की बैंकॉक में मुलाकात की कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन उम्मीद है कि दोनों पक्ष संबंधों में तनाव दूर करने और ज्यादा रचनात्मक रास्ता तलाशने के लिए अलग से बात करेंगे।

पर भारत के विदेश मंत्रालय के बयान से यह स्पष्ट हो गया कि इस संक्षिप्त बैठक के बारे में बांग्लादेश की तरफ से जो बयान जारी किया गया, वह भारत के लिए अस्वीकार्य था।

अब टिपरा मोथा पार्टी के प्रमुख की बातों पर गौर करने के लिए हमें भारत और बांग्लादेश के भौगोलिक मानचित्र को देख लेना चाहिए। श्री देववर्मन ने चटगांव तक का इलाका भारतीय नियंत्रण में लेने की बात कही है।

इस इलाके में भी बांग्लादेश ने शायद अपनी भौगोलिक स्थिति पर गौर नहीं किया है जबकि श्री देववर्मन वहां की भौगोलिक और सामाजिक स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ है। सिलिगुड़ी के पास के चिकन नेक की चर्चा करने वाले मोहम्मद युनूस अपने देश के इल क्षेत्र पर ध्यान देना शायद भूल गये हैं। मानचित्र में देखने से साफ हो जाता है कि त्रिपुरा और मिजारोम की सीमा से यह इलाका काफी करीब है और सिर्फ फेनी नदी की एक तरफ से आगे बढ़ने पर बांग्लादेश का यह पहाड़ी इलाका पूरी तरह अलग पड़ जता है। यानी प्रद्योत देववर्मन ने बिना सोचे समझे यह बात नहीं कही है और यह दावा भी सही है कि इस इलाके में आदिवासी और हिंदू अधिक संख्या में रहते हैं।