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झारखंड की अफसरशाही में शह और मात का खेल शुरु

कई अफसरों के खिलाफ विभागीय उच्चाधिकारी


  • सुप्रीम कोर्ट का फैसला बना है बाधक

  • सीएस और डीजीपी के खिलाफ गिरोह

  • दिल्ली से वकीलों से मिल आया अफसर


राष्ट्रीय खबर

रांचीः लोकसभा चुनाव निपटने के बाद आदर्श आचार संहिता समाप्त होते ही झारखंड के कई अफसर अपनी पुरानी आदतों के रास्ते पर दोबारा चल पड़े हैं। इन अफसरों की हरकतों को प्रोजेक्ट भवन अथवा पुलिस मुख्यालय के लोग अच्छी तरह जानते हैं। सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को या तो इनकी कारगुजारियों की भनक नहीं होती अथवा वे इसी संस्कृति को संरक्षण देकर अपना काम निकालना चाहते हैं। नतीजा है कि ऊपर से नीचे तक के सरकारी विभागों की काम करने की गति सुस्त पड़ जाती है।

नई जानकारी के मुताबिक अफसरों का एक गिरोह फिर से राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी को हटाने के लिए सक्रिय हो उठा है। संख्याबल की बात करें तो इस गिरोह के अफसरों की संख्या कोई कम नहीं है। दरअसल राज्य में रघुवर दास के शासनकाल में ही पहली बार इस किस्म की गुटबाजी को प्रोत्साहन मिला था, जिसे तत्कालीन मुख्य सचिव राजवाला वर्मा ने काफी बढ़ावा दिया। उस वक्त को इस गिरोहबंदी में शामिल एक अफसर जेल में है तो दूसरा सत्ता बदलने की वजह से चुपके से केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली जा चुका है। गिरोह के बाकी लोग यहीं पर विभिन्न विभागों के उच्च पदों पर है।

व्यूरोक्रेसी की इस हालत को देखते हुए नये आइएस और आईपीएस अफसर भी इसी सांचे में ढल रहे हैं। इसका नतीजा है कि स्थानीय निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की पहुंच सिर्फ प्रखंड और थाना स्तर तक सीमित हो गयी है। जिला मुख्यालय में पदस्थापित अफसर भी अब रांची से ही संचालित हो रहे हैं। अपुष्ट जानकारी के मुताबिक मुख्य सचिव और डीजीपी को बदलने की प्रक्रिया सुखदेव सिंह के सेवानिवृत्त होने के दौरान ही प्रारंभ हो चुकी थी। राजनीतिक उथलपुथल की वजह से इस साजिश को अमली जामा तब नहीं पहनाया जा सका था।

अब राजनीतिक अस्थिरता का दौर समाप्त होने के बाद फिर से झारखंड में एक नये मंत्री के तौर पर कल्पना सोरेन के आने की चर्चा ने इस गिरोह को सक्रिय कर दिया है। सूत्रों की मानें तो इस किस्म के खेल में माहिर एक पुलिस उच्चाधिकारी हाल ही में पांच दिनों के लिए दिल्ली हो आये हैं। वहां उन्होंने वरीय वकीलों के इस बात की सलाह की है कि दो साल के कार्यकाल को बीच में बदलने की स्थिति में क्या कुछ हो सकता है।

दूसरी तरफ कार्यालय का लंबा अनुभव रखने वाले वरिष्ठ कर्मचारियों का मानना है कि खास तौर पर डीजीपी की पदस्थापना के लिए सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला है, उसे बदलने का अर्थ अदालत की अवमानना है, लिहाजा कोई भी बड़ी आसानी से ऐसा करने के लिए और अपने लिए नई मुसीबत मोल लेने के लिए तैयार नहीं होगा। इसके बाद भी सक्रिय गिरोह के वरिष्ठ अफसर सत्ता के आस पास के लोगों को प्रभावित करने में जी जान से जुटे हुए हैं।