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जातिगत जनगणना से परेशानी किसे है

बिहार में केंद्र सरकार की आपत्ति के बाद भी जातिगत जनगणना का काम प्रारंभ हो गया है। इस मुद्दे पर नीतीश कुमार से यह मांग तेजस्वी यादव ने खुद की थी जब वह विपक्ष के नेता थे। बाद में एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भी दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिला था।

केंद्र की आपत्ति को दरकिनार करते हुए बिहार सरकार ने यह काम प्रारंभ कर दिया है। इससे स्पष्ट तौर पर जातिगत गोलबंदी का लाभ किसे मिलेगा, यह समझा जा सकता है। फिर भी इसका विरोध हो रहा है लेकिन विरोध क्यों है या इस जनगणना से समाज को क्या परेशानी है, इसके समर्थन में समझने लायक तर्क बहुत कम आ रहे हैं। इसलिए यह समझना जरूरी है कि सत्ता शीर्ष पर कब्जा की होड़ में यह जातिगत जनगणना बहुत सारे लोगों के लिए प्रश्नचिह्न बनकर उभरने जा रहा है।

जाहिर तौर पर कई राज्यो में ओबीसी आरक्षण को लेकर लंबे समय से आंदोलन चल रहा है। सरकारों के लिए यह मांग भी गले की हड्डी बनी हुई है। ऐसे में किस जाति या उपजाति के कितने लोग हैं, इसका परिणाम सामने आने पर बहुत सारे राजनीतिक समीकरण अपने आप ही बदल जाएंगे।

इस बात को वैसे लोग अच्छी तरह समझ रहे हैं तो जातिगत तौर पर कम संख्या में होने के बाद भी अपने अनुभव की वजह से प्रभावशाली भूमिका में है। दूसरी तरफ शिक्षा के प्रसार की वजह से पिछड़े और अति पिछड़े लोगों में अब जागरुकता अधिक हो चुकी है।

वे भी अच्छी तरह समझ रहे हैं कि समाज में अधिक आबादी होने के बाद भी विकास का उतना लाभ इन वर्गों के नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में जनगणना के परिणाम सामने आने के बाद वे इस आबादी के अनुपात में सत्ता में अपनी हिस्सेदारी की मांग करेंगे।

यह मांग ही राजनीतिक उथलपुथल लाने के लिए नयी वजह बनेगी। वर्तमान स्थिति में ऐसा आमूलचूल परिवर्तन हो, इसे अनेक लोग खुले मन से स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, विरोध की असली वजह शायद यही है। इसी बीच बिहार सरकार की ओर से राज्य में कराई जाने वाली जातिगत जनगणना के खिलाफ दायर याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है।

कोर्ट ने मामले में तत्काल सुनवाई के लिए भी हामी भर दी है। सर्वोच्च न्यायालय याचिका पर 13 जनवरी को सुनवाई करेगा। अधिवक्ता बरुण कुमार सिन्हा ने जनहित याचिका में बिहार सरकार के उप सचिव द्वारा राज्य में जातिगत जनगणना कराने के लिए जारी अधिसूचना को रद्द करने और अधिकारियों को इस पर आगे बढ़ने से रोकने की मांग की है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि छह जून 2022 को जारी अधिसूचना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है, जिसमें विधि के समक्ष समानता और कानून के समान सरंक्षण का प्रावधान है। याचिकाकर्ता ने कहा कि अधिसूचना गैर कानूनी, मनमानी, अतार्किक और असंवैधानिक है।

नालंदा निवासी अखिलेश कुमार ने अपनी याचिका में कहा है कि अगर जाति आधारित सर्वेक्षण का घोषित उद्देश्य उत्पीड़न की शिकार जातियों को समायोजित करना है तो देश और जाति आधारित भेद करना तर्कहीन और अनुचित है। इनमें से कोई भी भेद कानून में प्रकट किए गए उद्देश्य के अनुरूप नहीं है।

अधिवक्ता बरुण कुमार सिन्हा ने जनहित याचिका में बिहार सरकार के उप सचिव द्वारा राज्य में जातिगत जनगणना कराने के लिए जारी अधिसूचना को रद्द करने और अधिकारियों को इस पर आगे बढ़ने से रोकने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट में इस पर क्या फैसला आता है, यह भविष्य की बात है लेकिन इससे वर्तमान सत्तारूढ़ गठबंधन को आगामी चुनावों में फायदा हो सकता है, यह तय हो गया है।

दरअसल बिहार के चालीस लोकसभा और 243 विधानसभा सीटों का भी भारतीय राजनीति पर असर पड़ता है, इसे हर राजनीतिक दल के चुनावी सेनापति अच्छी तरह जानते हैं। लिहाजा ऐसे राज्य में जातिगत गोलबंदी किसी एक तरफ होने लगे तो उससे दूसरे पक्ष को परेशानी होना स्वाभाविक है।

पिछले लोकसभा में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने 39 सीटें यहां से जीती थी और भाजपा के केंद्र की सत्ता में आने का रास्ता मजबूत किया था। अब नीतीश कुमार इस गठबंधन से अलग हो चुके हैं और भाजपा अकेली पड़ गयी है। आगामी लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को पिछली बार के 17 सीटें में से कितनी सीटों का नुकसान होगा, यह चिंता भी जातिगत जनगणना के विरोध में शामिल है।

तय है कि समाज के अलग अलग वर्गों को उनकी आबादी का अनुपात जानने का हक है। इस जानकारी से किसी को परेशानी भी नहीं है क्योंकि चुनावों में किस सीट पर किस जाति के कितने मतदाता है, इसकी गणना चुपचाप होती है। अब आबादी के अनुपात में सत्ता में भागीदारी की मांग कई दलों को परेशान कर सकती है और इस प्रक्रिया का विरोध शायद इसी वजह से हो रहा है।