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जांच में हर बार पूर्व सरकार को लपेटने का काम

  • पहले खनन घोटाला हुआ तो सरयू राय आये

  • जमीन घोटाला हुआ तो आईएएस फंसते गये

  • शराब घोटाला में भी पूर्व सरकार की भूमिका

राष्ट्रीय खबर

रांचीः प्रवर्तन निदेशालय की हालिया कार्रवाई फिर से यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि जांच की गाड़ी हर बार उस दिशा में क्यों बढ़ जाती है, जिसमें पूर्व की रघुवर दास सरकार भी संदेह के घेरे में आ जाए। लगातार हुई ईडी की कार्रवाइयों से यह सवाल स्वाभाविक तौर पर उभर रहा है। वैसे भी पंद्रह सितंबर को ईडी के वर्तमान निदेशक के हटने के बाद क्या होगा, यह तो ईडी के अंदर भी एक बड़ा सवाल बन गया है। वर्तमान निदेशक संजय मिश्रा के बारे में चर्चा है कि उन्हें मुख्य जांच अधिकारी जैसा एक पद देकर मोदी सरकार अपने साथ रखने जा रही है।

झारखंड की बात करें तो जब ईडी ने पहली बार खनन घोटाला का काम प्रारंभ किया तो गोड्डा के सांसद निशिकांत दुबे को इसकी सूचना सबसे पहले मिल रही थी। कुछ ऐसा हो रहा था मानों श्री दुबे सीधे ईडी के संपर्क में हों और कहां क्या हो रहा है, इसकी पलपल की सूचना उन्हें मिल रही थी। माहौल कुछ ऐसा बनाया गया था मानों अब ईडी की जाल में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन फंसने जा रहे हैं।

माइनिंग लीज के दस्तावेज तथा संथाल परगना के चालानों से यही संकेत मिले थे। बाद में जब जमशेदपुर के विधायक सरयू राय ने ईडी के दस्तावेजों को खंगाल कर बयान जारी किया, उसके बाद से सारा मामला ठंडे बस्ते में चला गया। दरअसल ईडी की चार्जशीट से ही यह बात निकलकर आयी कि वर्तमान सरकार से ज्यादा गड़बड़ी तो पूर्व के रघुवर दास के शासनकाल में हुई थी। उसके बाद तुरंत ही यह मामला भाजपा के प्रचार के एजेंडे से बाहर चला गया।

इसी तरह जमीन घोटाला मामले में रांची के पूर्व उपायुक्त छवि रंजन को जेल भेजने के बाद से जांच की गाड़ी कुछ इस तरह आगे बढ़ी कि उसकी आंच उससे पहले के उपायुक्त राय महिमापत रे तक जा पहुंची। यह बहुत कम लोग जानते हैं कि महिमापत रे भी बुलडोजर सरकार के करीबी अफसर है। इसलिए वह जांच एक नई दिशा में आगे बढ़ी और अभी वरीय आईएएस अधिकारी अविनाश कुमार की तरफ जा पहुंची।

लेकिन इसके साथ ही छत्तीसगढ़ के शराब घोटाले की नकल झारखंड में भी करने का दावा अपुष्ट माध्यमों से प्रचारित किया गया। इसलिए मामला फिर से उलझता हुआ नजर आता है। दरअसल इसी मॉडल को पूर्व के रघुवर दास सरकार के शासनकाल में भी पहली बार अपनाया गया था। यह सभी जानते हैं कि उस वक्त इसकी जिम्मेदारी में अविनाश कुमार ही थे। कुल मिलाकर यह स्पष्ट होता जा रहा है कि हेमंत सोरेन के शासनकाल में गड़बड़ियों को पकड़ने के क्रम में अधिकारियों का वह समूह सामने आता जा रहा है, जो रघुवर दास के शासनकाल में भी सरकार में सबसे शक्तिशाली समूह था।

ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि हर जांच को कुछ इस तरह आगे बढ़ाया जा रहा है कि इस हिस्से का रिश्ता भाजपा के साथ जुड़ने की वजह से जांच किसी अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाये। वैसे यह स्पष्ट हो चुका है कि छत्तीसगढ़ मॉडल पर शराब के कारोबार से इस वित्तीय वर्ष में झारखंड सरकार को राजस्व का नुकसान होने वाला है। पहले भी कई स्थानों पर नकली चालान जमा करने की घटनाएं धीरे धीरे सामने आ चुकी है। लिहाजा यह प्रश्न प्रासंगिक हो गया है कि क्या ईडी भी जांच को  किसी ठोस नतीजे तक पहुंचाने से परहेज कर रही है।