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नवीन पटनायक  को लेकर भी चर्चा का बाजार गर्म

  • समान दूरी बनाकर चल रहे थे पटनायक

  • अचानक ही उनके नहीं आने की सूचना फैली

  • आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर हर तरफ चर्चा

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः देश के आठ विपक्षी मुख्यमंत्रियों का नीति आयोग की बैठक में शामिल नहीं होने की सूचना कोई बड़ी बात नहीं थी। इस बैठक में अचानक से उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का नहीं आना चर्चा और अटकलबाजी के बाजार को गर्म कर दिया है।

ममता बनर्जी और नीतीश कुमार की तरह ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक केंद्र द्वारा बुलाई गई नीति आयोग की बैठक में नहीं गए। नवीन ने मोदी सरकार के खिलाफ सीधे तौर पर कोई शिकायत नहीं की, लेकिन शनिवार की बैठक में व्यस्त कार्यक्रम का हवाला देकर अनुपस्थित रहे। जो निस्संदेह राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समझा जा रहा है।

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी संघीय ढांचे पर केंद्र के हमले सहित कई मुद्दों पर नीति आयोग के विरोध का नेतृत्व करने वाली पहली महिला थीं। सात अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने उनके दिखाए मार्ग का अनुसरण किया। नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल, अशोक गहलोत, एमके स्टालिन, सिद्धारमैया, भगवंत सिंह मान, पिनाराई विजयन ने बैठक का बहिष्कार किया। जैसा कि अब तक अपेक्षित था।

लेकिन तभी पता चला कि नवीन पटनायक अपने व्यस्त कार्यक्रम के कारण बैठक में शामिल नहीं होंगे। जिसने राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट बढ़ा दी है। अब सवाल उठ गया है कि  क्या नवीन पटनायक दोनों नावों की सवारी कर रहे हैं। वैसे तो उनकी पार्टी ने नये संसद भवन के उदघाटन समारोह में भाग लेने का एलान किया है।

दरअसल, केंद्र की नीति आयोग की बैठक को लेकर कई तरह की शिकायतें आ रही हैं। इस बैठक में स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, अधोसंरचना विकास पर चर्चा होनी है मालूम हो कि 2047 तक भारत को विकसित देश कैसे बनाया जाए, इस पर भी चर्चा हो रही है। दिल्ली ने बैठक का एजेंडा भी तैयार किया।

वे मूल रूप से नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यक्रम हैं। इस बार भी पीएम गति शक्ति, विकसित भारत-2047 की तरह केंद्र की लघु और मध्यम उद्योगों को विकसित करने की योजना एजेंडे में है। हालाँकि, पिछली योजना परिषद या वर्तमान नीति आयोग का मुख्य विचार यह था कि राज्यों को भी समान रूप से अपने विचार प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना चाहिए।

गैर भाजपा राज्यों ने आरोप लगाया कि नीति आयोग उस प्रक्रिया से हट गया था। पहले की योजना परिषदों की तुलना में नीति आयोग के कई पहलुओं में मूलभूत अंतरों में से एक यह है कि संगठन तेजी से प्रधान मंत्री केंद्रित हो गया है। देश के कई वरिष्ठ मुख्यमंत्रियों को लगता है कि सिर्फ प्रधानमंत्री का भाषण सुनने के लिए पूरा दिन और सरकारी पैसा खर्च करने लायक नहीं है।

पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों ने विभिन्न आरोप लगाते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने केंद्रीय योजना के चलते एजेपी राज्यों का बकाया रोका है। राज्य सरकारें आम आदमी को सजा देते हुए लाभ से वंचित कर रही हैं। नीति आयोग की बैठकों में परियोजनाओं पर चर्चा होने के बावजूद फंड रोकने के केंद्र के एकतरफा फैसले से नीति आयोग का कोई लेना-देना नहीं है। इसके बीच ही 2024 का चुनाव करीब आने की वजह से हर गतिविधि को चुनावी राजनीति के चश्मे से देखा जाने लगा है।