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अडाणी की जांच में सेबी की देरी क्यों

शनिवार को सेबी ने अदाणी जांच पूरी करने की समय-सीमा 6 महीने तक बढ़ाए जाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। बाजार नियामक द्वारा सौंपी गई याचिका में दो महीने के अंतर जांच पूरी करने की राह में आई कुछ समस्याओं का जिक्र किया गया है।

सर्वोच्च न्यायालय ​से किए गए अनुरोध में सेबी ने कहा है, जांच के लिए कई घरेलू के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय बैंकों से बैंक स्टेटमेंट प्राप्त करने की जरूरत होगी और 10 साल पहले किए गए लेनदेन के लिए भी बैंक स्टेटमेंट जरूरी होंगे। इसमें समय लगेगा और यह चुनौतीपूर्ण कार्य होगा।

12 फरवरी से 22 अप्रैल के बीच, सेबी ने अदाणी समूह की वि​भिन्न सूचीबद्ध और गैर-सूचीबद्ध कंपनियों से दस्तावेज मांगने के संबंध में समूह को 11 बार पत्र लिखे थे। लेकिन सेबी ने यह नहीं बताया है कि इतनी तेजी से ऊपर जाते इस समूह के मामले में उसका ध्यान पहले क्यों नहीं गया था। सेबी की दलील इसी वजह से संदेह के घेरे में आ रही है। हिंडनबर्ग के आरोपों को लेकर भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की जांच इस वजह से भी धीमी पड़ गई है कि वै​श्विक नियामकों, खासकर कुछ खास विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के अल्टीमेट बेनीफि​शियल ऑनर​शिप से जानकारियां जुटाई जा रही हैं।

इस घटनाक्रम से अवगत एक व्य​क्ति ने नाम नहीं बताने के अनुरोध के साथ कहा, यह काम करने की प्रक्रिया बेहद जटिल प्रक्रिया है। इसमें वि​भिन्न नियामकों पत्र लिखकर जानकारी हासिल करने की जरूरत होती है, जिनमें से कुछ वि​भिन्न समझौतों के कारण इस तरह की जानकारी साझा नहीं कर सकते हैं।

सूत्रों का कहना है कि सेबी ने अदाणी मामले में जांच के संदर्भ में पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान वि​भिन्न क्षेत्रा​धिकारों में मौजूद प्रतिभूति नियामकों को पत्र लिखे हैं। मांगी गई कुछ जानकारियों में विदेशी वित्तीय संस्थानों से बैंक स्टेटमेंट, विदेश से जुड़ी इकाइयों की पृष्ठभूमि, उन्हें मिले लाइसेंस और अदाणी समूह कंपनियों द्वारा विदेशी नियामकों को सौंपे पत्र शामिल हैं। मॉरिशस, संयुक्त अरब अमीरात, साइप्रस और कई कैरीबियाई द्वीप समेत वि​भिन्न देशों में अदाणी समूह कंपनियों के लेनदेन हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट में आरोप लगाए जाने के बाद जांच के घेरे में आ गए हैं।

दूसरी तरफ विवाद के केंद्र में आये बड़े भाई विनोद अडाणी का कुछ कंपनियों से इस्तीफा भी शक को और बढ़ाता है। एक कानूनी विश्लेषक ने कहा, मांगे गए आंकड़ों की मात्रा पर भी निर्भर करते हैं। सभी नियामक मुख्य जानकारी प्रदान करने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं और इस संबंध में उनसे बार बार अनुरोध किए गए हैं और इस वजह से यह प्रक्रिया जटिल हो सकती है।’

सेबी को अदाणी मामले से संबंधित विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के अंतिम लाभार्थियों की जानकारी प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए नियामक विदेशी न्यायिक क्षेत्र से इस तरह की जानकारी जुटाने के लिए केंद्र सरकार या कानून प्रवर्तन एजेंसियों की मदद मांग सकता है।

घटनाक्रम की जानकारी रखने वाले दो सूत्रों ने बताया कि बाजार नियामक इस मामले को केंद्रीय मंत्रालयों के पास भेजने पर विचार कर रहा है क्योंकि कुछ विदेशी नियामक गोपनीयता भंग होने का हवाला देते हुए मांगी गई जानकारी मुहैया नहीं कर रहे हैं। समझा जाता है कि सेबी ने बरमूडा, लक्जमबर्ग और स्विट्जरलैंड सहित कई देशों के नियामकों को पत्र लिखकर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के बारे में जानकारी मांगी है।

कानून प्रवर्तन एजेंसियां सूचना प्राप्त करने के लिए लेटर रेगुलेटरी और परस्पर कानूनी सहायता संधि के माध्यम से न्यायिक सहायता का विकल्प अपना सकती हैं। एल आर जांच में न्यायिक मदद के लिए विदेश की अदालत से किया गया औपचारिक अनुरोध होता है और एमएलएटी अनुरोध विदेश में रहने वाले गवाहों की जांच और साक्ष्य जुटाने के लिए किया जा सकता है। अंतिम लाभार्थी मालिक ऐसी इकाइयां होती हैं, जिनका एफपीआई पर नियंत्रण या स्वामित्व होता है।

नियामकीय सूत्र ने कहा कि सेबी विदेश के नियामकों के साथ किए गए अपने अंतरराष्ट्रीय समझौता ज्ञापन के तहत सूचना साझा करने के अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है। लेकिन इस मामले में मांगी गई जानकारी नियामक की आवश्यकता से परे है, जिससे उसे इस तरह की सूचना हासिल करने में मुश्किल आ सकती है।

असली लाभ कमाने वाले के बारे में जानकारी हासिल करना और भी कठिन हो जाएगा, खास तौर पर उन मामलों में जहां अंतिम निवेशक कई कारणों से सहयोग करने के इच्छुक नहीं हों। अदाणी समूह पर हिंडनबर्ग द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने सेबी को 2 मई तक का समय दिया था।

मगर जांच में जटिलता देखते हुए सेबी ने शनिवार को शीर्ष अदालत से 6 महीने की मोहलत मांगी है। सेबी ने अपने आवेदन में कहा है कि कई देसी और अंतरराष्ट्रीय बैंकों से खातों का विवरण जुटाने के लिए उसे थोड़ा और वक्त चाहिए। यानी राहुल गांधी के प्रश्न अब भी यथावत खड़े हैं कि बीस हजार करोड़ किसका है।