असली लड़ाई का मैदान कहीं और शिफ्ट हो गया
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संख्याबल में हेमंत सोरेन भारी दिख रहे हैं
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पहले भी विधायकों का वोट फिसलता रहा है
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इसे व्यापक परिदृश्य में देखने की जरूरत
राष्ट्रीय खबर
रांचीः झारखंड की राजनीति में राज्यसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा परिमल नाथवाणी को उम्मीदवार के रूप में समर्थन देना एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। नाथवाणी पहले भी झारखंड से राज्यसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं, लेकिन इस बार का चुनावी परिदृश्य पिछली बार की तुलना में काफी अलग और जटिल है।
वर्तमान में राज्य की सत्ता हेमंत सोरेन के नेतृत्व में है। हालांकि हेमंत सोरेन ने कांग्रेस नेतृत्व के प्रति अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर की थी, लेकिन अंततः उन्होंने गठबंधन धर्म का पालन करते हुए कांग्रेस प्रत्याशी को समर्थन देने का निर्णय लिया है। इस समीकरण के कारण वर्तमान में पलड़ा महागठबंधन के पक्ष में झुका हुआ प्रतीत होता है। इसके बावजूद, निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवाणी को जीत सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता है। राजनीति के गलियारों में चर्चा है कि महागठबंधन के भीतर के कुछ सहयोगी दल अपनी निष्ठा बदल सकते हैं, जो सामान्य चुनावी उठापटक का हिस्सा है।
परंतु, इस चुनाव का वास्तविक अर्थ मात्र संख्या बल तक सीमित नहीं है। इसका गहरा संबंध देश के औद्योगिक जगत में चल रहे बड़े संघर्ष से है। हाल ही में जेपी एसोसियेट्स की खरीद को लेकर अडाणी समूह और वेदांता समूह के अनिल अग्रवाल के बीच सीधी टक्कर देखने को मिली है।
अनिल अग्रवाल द्वारा अडाणी समूह के खिलाफ आवाज उठाने के कुछ ही समय बाद उनके परिसरों पर प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी हुई है। इस घटनाक्रम को महज एक संयोग के रूप में नहीं देखा जा रहा है, क्योंकि पहले भी अडाणी समूह के व्यावसायिक हितों के खिलाफ खड़े होने वाले कई औद्योगिक समूहों के खिलाफ सरकारी जांच एजेंसियों की सक्रियता देखी गई है।
इस पूरे प्रकरण में एक महत्वपूर्ण पहलू अनिल अग्रवाल और स्वर्गीय धीरूभाई अंबानी के बीच के पुराने संबंधों का है। अनिल अग्रवाल ने कई बार सार्वजनिक मंचों से स्वीकार किया है कि उनके करियर और व्यावसायिक सफलता में धीरूभाई अंबानी का मार्गदर्शन और योगदान रहा है। इसलिए, वेदांता पर हो रही कार्रवाई को केवल एक कंपनी के खिलाफ जांच के रूप में नहीं, बल्कि परोक्ष रूप से अडाणी बनाम अंबानी के औद्योगिक संघर्ष के एक नए अध्याय के रूप में भी देखा जा सकता है।
झारखंड के संदर्भ में देखें तो गोड्डा में अडाणी समूह का पावर प्लांट पहले से ही स्थापित है। ऐसे में यदि रिलायंस समूह के बेहद करीबी माने जाने वाले परिमल नाथवाणी राज्यसभा पहुंचते हैं, तो यह राज्य में एक पूरी तरह से नए औद्योगिक-राजनीतिक समीकरण को जन्म देगा। वर्तमान परिस्थितियों में केंद्र सरकार के लिए इस दूरी को पाट पाना चुनौतीपूर्ण लग रहा है। अतः, परिमल नाथवाणी का झारखंड से उम्मीदवार बनना महज एक राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि एक सोची-समझी औद्योगिक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है।