Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
Digital Censorship in Russia: रूस में इंटरनेट पर सख्त पाबंदियां; दो-दो फोन रखने को मजबूर हुए रूसी ना... Bank Holidays June 2026: अगले हफ्ते बैंक जाने से पहले चेक करें लिस्ट, 15 से 21 जून के बीच इन राज्यों... Google New Project: अब पुराने स्मार्टफोन बनेंगे सुपर कंप्यूटर! डेटा सेंटर के रूप में इस्तेमाल करने क... Sunday Sun Worship: रविवार के दिन सूर्य देव की पूजा क्यों है खास? जानें अर्घ्य देने का सही समय और नि... Healthy Monsoon Diet: बारिश के मौसम में इम्यूनिटी बढ़ाने के आसान उपाय; किचन में मौजूद ये चीजें हैं सब... Greater Noida News: जीएल बजाज कॉलेज के गर्ल्स हॉस्टल में सुरक्षाकर्मी ने तीसरी मंजिल से कूदकर दी जान... Noida Cyber Crime: एयर टिकट के नाम पर करोड़ों की ठगी; नोएडा में फर्जी कॉल सेंटर का भंडाफोड़, 13 गिरफ्त... Dehradun News: बैरागीवाला गांव में युवक की हत्या के बाद भारी तनाव; गुस्साए लोगों का हंगामा, पुलिस बल... Drone Post Delivery in Himachal: हिमाचल में ड्रोन से पहुंचेगी डाक; मंडी-रेहरधार मार्ग पर सफल ट्रायल,... Greater Noida News: जिम में वर्कआउट के बाद 20 वर्षीय युवक की मौत; हार्ट अटैक की आशंका से मचा हड़कंप

अडाणी प्रेम से पार्टी में भी अकेले हैं मोदी

वर्तमान में परिस्थितियां नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की घरेलू और विदेश नीति की आलोचना करती है। यह तर्क देता है कि मोदी का अच्छे दिन का वादा एक बड़ा घोटाला साबित हुआ है, और उनकी सरकार के दौरान देश से भारी मात्रा में काला धन बाहर चला गया है। लेखक का मानना है कि मोदी एक वैश्विक धोखेबाज़, डोनाल्ड ट्रंप, के जाल में फंस गए हैं।

ट्रंप ने भारतीय उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाकर भारत का अपमान किया है, जिसके कारण देश के हित खतरे में आ गए हैं। प्रधानमंत्री मोदी पर घरेलू राजनीति में भी संकटों का सामना करने का आरोप लगाया गया है। ऑपरेशन सिंदूर पर संसदीय बहस के दौरान विपक्ष ने सवाल उठाए हैं।

राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि मोदी ने ट्रंप के कहने पर पाकिस्तान को फायदा पहुँचाया और युद्ध में भारतीय सेना के हाथ-पैर बाँध दिए। इसके अलावा, राहुल गांधी ने पिछले लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग और भाजपा के बीच मिलीभगत से वोटों में धांधली का आरोप लगाया है।

चुनाव आयोग पर मतदाता सूची में नागरिकता को प्राथमिक शर्त बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में भी सवाल उठाए गए हैं, जिससे भाजपा भी मुश्किल में है। मोदी के 75 साल के होने की बात भी उठाई गई है, जो भाजपा की परंपरा के अनुसार नेताओं के लिए महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से हटने की उम्र है।

यह तर्क दिया गया है कि अगर सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के फैसले को खारिज कर देता है, तो भाजपा को बिहार, बंगाल, और असम जैसे राज्यों में अच्छे नतीजे मिलने की उम्मीद कम है, जिससे मोदी के लिए प्रधानमंत्री पद पर बने रहना मुश्किल हो सकता है। पार्टी के भीतर भी मोदी के नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं, जिसका प्रमाण राष्ट्रपति चुनाव में चल रही आंतरिक खींचतान से मिलता है।

तर्क है कि मोदी सरकार की विदेश नीति हिंदुत्ववादी विचारधारा से प्रभावित है। भारत के राजनयिक संबंध हिंदुत्व को बढ़ावा देने पर केंद्रित हो गए हैं। विदेशों में भारतीय दूतावासों का काम भारत को एक हिंदू-बहुसंख्यक देश के रूप में पेश करना हो गया है। प्रधानमंत्री के विदेश दौरों में मंदिरों का दौरा और शिलान्यास शामिल हैं, जैसे कि 2021 में बांग्लादेश दौरे के दौरान।

लेखक का मानना है कि इस तरह की नीति ईसाई-बहुल यूरोप और अरब देशों में लंबे समय तक स्वीकार्य नहीं होगी, खासकर तब जब भारत में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के आरोप लग रहे हैं। दूसरा कारण यह है कि विदेश नीति कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों जैसे अडानी और अंबानी के हितों को साधने के लिए बनाई गई है।

पिछले 11 वर्षों में विभिन्न देशों के साथ संबंधों में इन उद्योगपतियों के हितों को प्राथमिकता दी गई है। यह नीति सभी देशों को स्वीकार्य नहीं है, लेकिन कुछ देश यह समझ गए हैं कि अगर इन उद्योगपतियों को खुश कर दिया जाए तो भारत के साथ कामकाजी संबंध बनाना आसान है। मोदी का कमजोर और दिशाहीन नेतृत्व ही इस संकट का कारण है।

रूस से तेल खरीदने पर अमेरिका द्वारा लगाए गए अतिरिक्त शुल्क के बावजूद, भारत ने चीन और रूस के साथ अपनी गतिविधियाँ जारी रखीं। लेखक भारत और चीन के बीच संबंधों को सुधारने की आवश्यकता पर जोर देता है, लेकिन साथ ही यह भी मानता है कि चीन पाकिस्तान के साथ अपने रणनीतिक संबंध नहीं छोड़ेगा।

भारत की पड़ोसी देशों जैसे बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, और नेपाल के साथ बिगड़ते संबंधों पर भी चिंता जताई गई है, और इसके लिए जयशंकर की सेना (विदेश मंत्रालय) पर सवाल उठाए गए हैं। सभी पड़ोसी देश धीरे-धीरे चीन के प्रभाव में आ रहे हैं, जबकि भारत की खुफिया, सुरक्षा, और कूटनीतिक एजेंसियाँ कुछ भी पता नहीं लगा पाईं।

नेपाल में लगी आग इसका जीता जागता नमूना है, जिसके बारे में भारत को कोई भनक तक नहीं थी। अंत में यह निष्कर्ष निकलता है कि मोदी सरकार की हिंदुत्ववादी और व्यापार-केंद्रित विदेश नीति ने देश को संकट में डाल दिया है। वे कहते हैं कि भारत को देशहित में प्रधानमंत्री के साथ खड़ा होना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी सवाल उठाते हैं कि नरेंद्र मोदी के हाथों में देश कितना सुरक्षित है।

मोदी सरकार की नीतियों को एक गंभीर खतरे के रूप में देखता है, जो न केवल देश की विदेश नीति बल्कि उसकी घरेलू स्थिरता को भी नुकसान पहुँचा रही हैं। इन तमाम मुद्दों को अगर एकजुट कर देखें तो खुद का कद पार्टी से बड़ा करने की चाह में नरेंद्र मोदी अब सत्ता शीर्ष पर बिल्कुल अकेले खड़े नजर आते हैं। पार्टी के दूसरे नेताओँ ने भी धीरे धीरे उनसे दूरी बना ली है क्योंकि पार्टी के वरीयताक्रम में कई लोग उनसे वरीय अथवा समकक्ष श्रेणी में है। ऐसे में सिर्फ अमित शाह के भरोसे नहीं चला जा सकता।