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भेड़ियों का रंग एक बीमारी के कारण बदल रहा है

  • उत्तरी अमेरिका के जंगलों में दिख रहे हैं

  • एक जीन में बदलाव से रंग भी बदलता है

  • वायरस विशेषज्ञों को इसे भी जांचना चाहिए

वाशिंगटनः अमेरिका के पर्यावरण वैज्ञानिक काफी समय से इस दिशा में शोध कर रहे थे। पूरे उत्तरी अमेरिका के जंगलों में रहने वाले भेड़ियों में से अनेक का रंग बदल गया था। ऐसे भेड़िये दूर से काले रंग के नजर आते थे। आम तौर पर इस जंगली प्राणी के चमड़े का रंग मटमैला होता है और उनमें काले रंग के रोएं भी होते हैं।

अत्यंत कठिन बर्फीले माहौल में भी वे किसी तरह जीवित रह लेते हैं। इस क्रम में वे अपने शिकार का बहुत दूर तक पीछा कर झूंड में हमला कर उसे मार कर खा जाते थे। आम तौर पर ग्रे रंग के इन भेड़ियों में से कुछ काले रंग के क्यों हैं, यह बड़ा सवाल बना हुआ था। अब जाकर निरंतर शोध का बेहतर परिणाम निकला है।

इस रंग परिवर्तन को दरअसल एक बीमारी माना गया है। एक खास किस्म के वायरस के हमले में उनके शरीर का रंग बदल जाता है। फ्रांस के यूनिवर्सिटी ऑफ मोंटपेलियर के पर्यावरण वैज्ञानिक साराह क्यूबायेंस ने इसकी खोज की है। उन्होंने अपने दल के साथ मिलकर इस पर काम किया है।

उस वायरस की भी पहचान हुई है, जिसकी वजह से भेड़ियों का रंग बदलकर काला हो जाता है। इसे कैनाइन डिसटेंपर वायरस कहा गया है। दरअसल यह वायरस भी प्राणियों के लिए जानलेवा ही है। इस शोध की जानकारी रखने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड  के वैज्ञानिक टिम काउलसन कहते हैं कि दुनिया के शेष हिस्सों में भेड़ियों का रंग सामान्य होता है।

सिर्फ अमेरिका के ही कुछ इलाको में काले रंग के भेड़ियों की तादाद बढ़ती हुई नजर आ रही है। इससे स्पष्ट है कि यह वायरस भी इस प्रजाति के जानवरों में धीरे धीरे फैलता जा रहा है। येलोस्टान नेशनल पार्क के इलाके में हुए विस्तृत शोध के बाद यह पता चला है कि किस तरीके से यह वायरस हमला कर धीरे धीरे उस प्राणी की जान ले लेता है।

जंगल में रहने वाले प्राणी होने की वजह से उनकी मौत का आम तौर पर पता भी नहीं चल पाता है। इस शोध के क्रम में यह भी पता चला है कि काले रंग के भेड़ियों से उत्पन्न होने वाली अगली पीढ़ी जेनेटिक बदलाव के साथ पैदा होती है। इसलिए हो सकता है कि काफी समय के बाद इस जेनेटिक बदलाव से गुजरने वाले भेड़ियों की तादाद एक दूसरी प्रजाति के तौर पर होने लगे।

वैसे शोध दल ने पाया है कि इस वायरस को भेड़ियों के लिए ब्लैक प्लेग की संज्ञा दी जा सकती है। इसकी चपेट में आने वाले जानवार को धीरे धीरे कई बीमारियों घेर लेती है। जांच में पाया गया है कि भेड़ियो में एक जीन होता है, जिसकी वजह से उनका रंग ग्रे कलर का होता है। इस जीन को सीपीडी103 कहा गया है।

इस जीन में होने वाले बदलाव की वजह से पशु का रंग बदल जाता है। भेड़ियों के अलावा कुत्तों में भी काला रंग इस जेनेटिक बदलाव की निशानी है। वैसे उनके शरीर में एक खास प्रोटिन भी पाया गया है जो इस वायरस के खिलाफ प्रतिरोधक तैयार करता है। इस कारण वायरस की चपेट में आते ही भेड़ियों को फेफड़े का संक्रमण नहीं होता है।

जांच में पाया गया है कि भेड़िये अब प्राकृतिक तौर पर भी इस वायरस का प्रतिरोधक अपने शरीर के अंदर पैदा करना सीख गये हैं। इसके लिए बारह अलग अलग स्थानों पर भेड़ियों की जंच की गयी थी। इससे पता चला कि काले रंग के भेड़ियों की आबादी कुछ जंगलो में बढ़कर 45 प्रतिशत तक हो चुकी है।

इनमें काफी भेड़ियों के शरीर में प्राकृतिक प्रतिरोधक विकसित हो चुका है। फिर भी वैज्ञानिक यह मानते हैं कि इस वायरस पर अब वायरस विशेषज्ञों को और अच्छी तरह जांच कर कोई समाधान तलाश लेना चाहिए। उनका मानना है कि जिस तरीके से चमगादड़ के वायरस ने इंसानों के अंदर आकर तबाही मचायी है। इसी तरह यह वायरस भी भविष्य में इंसानों के लिए खतरा बन सकता है क्योंकि इंसानों की आबादी में इसका कोई प्रतिरोधक अब तक विकसित नहीं हुआ है।