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सड़क से उगता देश का नया नेतृत्व

देश की राजनीतिक गतिविधियां अचानक से बदलती नजर आ रही है। जिन्हें याद नहीं हो या पता नहीं हो उनके लिए बताना जरूरी है कि जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के वक्त भी कुछ ऐसा ही हुआ था। देश में पुराने नेतृत्व के कायम होने के बीच ही नये नेतृत्व का उदय हुआ था। इनमें लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, स्वर्गीय सुशील कुमार मोदी और शिवानंद तिवारी जैसे लोग थे।

इसके बाद की पीढ़ी में पश्चिम बंगाल में अलग टीएमसी का गठन कर ममता बनर्जी ने अपना नेतृत्व स्थापित किया था। अभी हाल ही में तमिलनाडु में जोसफ विजय का नेतृत्व उभार पर है। इन राजनीतिक नेताओँ के बीच कॉकरोच जनता पार्टी एक अलग ध्रुव के तौर पर स्थापित हो चुकी है। लिहाजा उनके नेताओँ को नये नेतृत्व में गिना जा सकता है। इससे पहले अरविंद केजरीवाल भी तेजी से राजनीति के आसमान पर उभरे हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा किए गए कथित उल्लंघनों के खिलाफ हुए उग्र सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों पर भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली में सुरक्षा के अत्यधिक कड़े प्रतिबंधों का समर्थन किया, जो एक विचारणीय प्रतिक्रिया है। इसके पीछे पार्टी का तर्क काफी समझने योग्य है। बीजेपी का मानना है कि देश का शासन संसद से चलाया जाना चाहिए—सड़कों से नहीं।

संसद, बिना किसी संदेह के, लोकतंत्र के प्रमुख मंदिरों में से एक है। लेकिन क्या सड़क हमेशा अराजकता और उथल-पुथल का ही प्रतीक होती है, जैसा कि बीजेपी की बयानबाजी से संकेत मिलता है? इसका उत्तर कतई हाँ में नहीं हो सकता। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोकतंत्र के विकास और उसके पल्लवित होने में सड़कों की एक बेहद महत्वपूर्ण और अभिन्न भूमिका रही है: ये दोनों आपस में एक सहजीवी (पारस्परिक) संबंध से बंधे हुए हैं।

प्राचीन एथेंस में लोकतंत्र का जो रूप विकसित हुआ, वह एगोरा (एक ऐसा सार्वजनिक स्थान जहाँ विचारों का स्वतंत्र आदान-प्रदान और अभिव्यक्ति होती थी) के बिना संभव ही नहीं था। उन्हीं में से कुछ विचार आज के समकालीन उदारवादी सोच के आधार स्तंभ के रूप में कार्य करते हैं। इसके विपरीत, साम्राज्यवादी रोम—अन्य भूभागों और कालखंडों के साम्राज्यों की ही तरह—सड़कों से उठने वाली आवाज़ों से हमेशा सशंकित और भयभीत रहता था।

आधुनिक युग में सत्ता परिवर्तन की कुछ सबसे उल्लेखनीय घटनाएँ—जैसे कि फ्रांसीसी क्रांति, यूरोप में आयरन कर्टन का गिरना, मध्य पूर्व और अफ्रीका में आया अरब स्प्रिंग, और निसंदेह औपनिवेशिक गुलामी के चंगुल से भारत की अपनी मुक्ति—इसलिए संभव हो सकीं क्योंकि आम नागरिकों ने सार्वजनिक चौराहों पर खड़े होकर दमन के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाई थी।

आम जनता ने न केवल तानाशाही शासनों को उखाड़ फेंका, बल्कि उनके विरोध प्रदर्शनों ने जिस लोकतंत्र को आकार देने में मदद की, उसी से उन संस्थाओं का निर्माण हुआ जिनका मुख्य उद्देश्य जनता के विचारों और आकांक्षाओं को आगे बढ़ाना है। इस प्रकार, संसद और उसके जैसी अन्य संस्थाएँ डेमोस यानी आम जनता के साथ लोकतंत्र के समझौते का केंद्र बिंदु हैं।

इतिहास ने यह भी साबित किया है कि जब भी ऐसी गरिमामयी संस्थाएँ जनता की सामूहिक चिंताओं और आशंकाओं के प्रति उदासीन या बेपरवाह रही हैं, तब-तब सड़कें लोगों की हुंकार से गूंज उठी हैं। इस समय जो विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, वे घटनाओं की इसी श्रृंखला का एक और ज्वलंत उदाहरण हैं। इसी बीच, दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थल की सूची से हटा (डिनोटिफाई कर) दिया है। यह कोई हैरान करने वाला फैसला नहीं है।

विडंबना यह है कि यह निर्णय स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि प्रशासन सड़कों की ताकत और उसकी क्षमता से भली-भांति परिचित है। विचारों की एक ऐसी धारा भी है जो यह तर्क देती है कि एकजुटता और लामबंदी के लिए एक प्रभावी उपकरण के रूप में तकनीक के आगमन ने सार्वजनिक स्थानों को विरोध प्रदर्शन के केंद्र के रूप में अनावश्यक या व्यर्थ बना दिया है।

लेकिन इस तरह का तर्क समय से पहले का है और भ्रामक है। आधुनिक तकनीक पर पकड़, आसानी और विश्वास होने के बावजूद, भारत की सड़कें आज भी युवाओं की आवाज़ से गूंज रही हैं। इस शोर में उल्लेखित तमाम नामों से अलग एक और चेहरा उभर रहा है। वामपंथी युवा नेत्री नेहा बोरा ने देश ही नहीं दुनिया  का ध्यान अपनी तरफ खींचा है।

हाल के तीन दिनों में इस अकेली लड़की ने दिल्ली पुलिस के सामने जो चुनौतियां खड़ी की है, वह एक नया संघर्ष है। इसलिए माना जा सकता है कि देश की राजनीति में नई पौध आगे आ रही है और सत्ता पर बैठे पुराने लोग इस चुनौती से निश्चित तौर पर बुरी तरह भयभीत है। भयभीत होने की वजह सिर्फ सत्ता जाना नहीं बल्कि फाइलों में दफन वे राज हैं, जो देश में उथल पुथल पैदा कर सकते हैं।