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कुड़मी और महतो नेतृत्व की लड़ाई में मूलवासी दरकिनार

सदानों की उपेक्षा पर हर तरफ चुप्पी क्यों

मूलवासी भी आंदोलन में शामिल रहे थे

मुख्यधारा की राजनीति से काट दिये गये

अंदर ही अंदर सुलह रही है बहुत बड़ी आग

शिव कुमार अग्रवाल

रांचीः झारखंड आंदोलन में मूलवासियों का पूर्ण समर्थन होने के बाद भी राज्य गठन के बाद राज्य के बहुसंख्यक सदान धीरे धीरे और बड़ी चालाकी से किनारे लगाये जा रहे हैं। राजनीति की मुख्य धारा में इन मूलवासियों के हितों की कोई चर्चा तक नहीं होती। यह अब की स्थिति है वरना अलग राज्य आंदोलन के दौर में सदानों की रैलियों में हजारों की भीड़ होती थी। दरअसल राज्य गठन के बाद से पिछड़ों के नेतृत्व की लड़ाई कुड़मी नेताओं के पास जाने के बाद से बड़ी चालाकी से सदानों को दरकिनार किया गया। इसका नतीजा है कि अब कोई भी राजनीतिक दल सदान हित की चर्चा तक नहीं करता।

राज्य के पूर्व की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक झारखंड में सबसे अधिक आबादी मूलवासियों की ही है। एचईसी बनने तथा झारखंड में पदस्थापित रहे कुछ अधिकारियों की कृपा से प्रवासियों की एक आबादी झारखंड में आयी है। राज्य गठन के बाद इस प्रक्रिया में और तेजी आयी है। इसके  बाद भी साठ फीसद से अधिक आबादी आज भी सदानों की है।

अजीब स्थिति है कि राज्य में आदिवासियों के हितों की मांग करने वाले अनेक नेता हैं। सिर्फ आदिवासी राजनीति करने की बदौलत अनेक लोग विधायक और सांसद की कुर्सी तक जा पहुंचे है। दूसरी तरफ मूलवासियों का खुलकर वकालत करने वाला कोई भी नेता अब मुख्य धारा की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान नहीं रखता। इसी वजह से जब भी हित की बात आती है तो यह एससी और एसटी अथवा ओबीसी तक सीमित होकर रह जाती है। जिस राज्य के गठन में मूलवासियों ने प्रमुख योगदान दिया था, उनमें दूसरी जातियों के लोग भी थे। वे साजिश के तहत किनारे लगा दिये गये।

अब यह स्थिति  बदलती हुई दिख रही है। कई अनौपचारिक बैठकों और चर्चाओं में इस मुद्दे को लेकर उठा रहे हैं क्योंकि वे महसूस कर रहे हैं कि मूलवासियों की बात रखने का समय आ गया है वरना वे मुख्य धारा की राजनीति से पूरी तरह काट दिये जाएंगे। प्रवासियों की आबादी पर आधारित राजनीतिक कुछ जिलों तक सीमित है। कुछ अन्य जिलों में राजनीति का फैसला आदिवासी आबादी करती है। इसके बाद भी मूलवासियों की बहुलता वाले इलाकों तक में इस वर्ग को पंचायत से लेकर संसद तक में कोई स्थान नहीं मिलता है। जिनलोगों को नेता समझा गया था, उनमें से कई कुड़मी नेता बनकर स्कूल, कॉलेज और अस्पताल खोलने में व्यस्त रहे। दूसरों ने सिर्फ अपने संगठन की बदौलत राजनीतिक सौदेबाजी की। मूलवासियों में सिर्फ महतो अथवा दलित ही नहीं बल्कि दूसरी जाति के लोग भी थे, जो आज मुख्य धारा की राजनीति मे वोट बैंक बनकर रह गये हैं। अंदरखाने में सुलग रही आग से ऐसा प्रतीत होता है कि शीघ्र ही राज्य को मूलवासियों या सदानों का एक बड़ा आंदोलन देखने को मिल सकता है।