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जनता के बदलते मिजाज को समझना होगा

लोकतंत्र की रक्षा के लिए नागरिकों की आवाजें अब पूरी मजबूती के साथ उठने लगी हैं। मुंबई के शिवाजी पार्क में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन के बाद, रविवार को दिल्ली में सैकड़ों लोगों ने पुलिस की दमनकारी कार्रवाई और ज्यादतियों का सामना करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कथित कदाचार के खिलाफ एक बड़ा मार्च निकाला।

उसी दिन मुंबई में ठाकरे बंधुओं—उद्धव और राज ठाकरे—द्वारा इसी मुद्दे पर आयोजित एक विरोध प्रदर्शन में भी भारी भीड़ उमड़ी। इस तरह के विरोध प्रदर्शन देश भर में लगातार हो रहे हैं या इनकी योजना बनाई जा रही है। इस बीच कई अन्य महत्वपूर्ण और प्रभावशाली आवाजें भी सामने आई हैं।

उदाहरण के लिए, शीर्ष अदालत के न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने लोकतंत्र में मतदान के अधिकार से वंचित किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताई है, जबकि भारत का विपक्ष इस विरोध को एक बड़े राष्ट्रव्यापी आंदोलन का रूप देने का प्रयास कर रहा है। शायद इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ कल सुप्रीम कोर्ट के पवित्र प्रांगण में देखने को मिला।

कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने अपने एक अंतरिम आदेश में मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से निलंबित तो नहीं किया, लेकिन केंद्र सरकार, भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई), सीईसी और दो अन्य चुनाव आयुक्तों को औपचारिक नोटिस जारी कर दिए। दिलचस्प बात यह है कि अदालत ने यह टिप्पणी की कि चुनाव आयोग से यह उम्मीद की जाती है कि वह सभी फैसले सर्वसम्मति से ले, जबकि द इंडियन एक्सप्रेस के खुलासे से यह साफ हो चुका है कि इस मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने फॉर्म 6 में किए गए किसी भी बदलाव का समर्थन नहीं किया है, जिसे लेकर याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इसका बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया गया है। चुनाव आयोग का हालिया निर्देश काफी हद तक रक्षात्मक प्रतीत होता है। आयोग ने उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक विशेष नामांकन अभियान की घोषणा की है, जहां मतदाता सूचियों के विवादास्पद ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) का काम पूरा हो चुका है।

इसका उद्देश्य उन मतदाताओं के नामांकन को सुगम बनाना है जिनके नाम सूची से गायब हैं। क्या यह कदम देश की सड़कों पर उमड़ रहे जनआक्रोश और लोगों के गुस्से की प्रतिक्रिया हो सकता है? लेकिन इस कदम ने भी कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जैसा कि एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने रेखांकित किया है, मतदाताओं के नाम की ‘बहाली’ फॉर्म 6 के माध्यम से होने की उम्मीद है, जो कि आमतौर पर नए मतदाताओं के लिए लागू होता है। एक ऐसा मतदाता जिसका नाम पहले से था और जिसे हटा दिया गया है, वह नया मतदाता नहीं है: ऐसे में वह इस दस्तावेज के जरिए पुनः प्रवेश के लिए कैसे पात्र हो सकता है?

सबसे डराने वाली बात यह है कि फॉर्म 6 में झूठी घोषणा किए जाने की स्थिति में दंडात्मक कार्रवाई किए जाने का प्रावधान भी है। जिन मतदाताओं के नाम सूची से अनुचित तरीके से काट दिए गए हैं, उन्हें अपनी बहाली और नाम शामिल कराने के लिए एक बिल्कुल नए और निष्पक्ष ढांचे की आवश्यकता है।

लेकिन क्या चुनाव आयोग ऐसा नया ढांचा तैयार करने के लिए तैयार है? लोकतंत्र की पवित्रता को बनाए रखने और जनता की नजरों में अपनी खोई हुई साख व विश्वसनीयता को वापस पाने के लिए उसे ऐसा करना ही होगा। कई बार सत्ता को सत्ता की वजह से चीजें साफ साफ नजर नहीं आती है। कई बार ताकत के बल पर हर आवाज को दबाने की भ्रम भी उपजता है।

फिर भी समझदार लोग यह महसूस कर सकते हैं कि बहुत तेजी से देश का माहौल बदलता जा रहा है। कभी नरेंद्र मोदी की हर बात को सत्य समझने वालों की संख्या तेजी से घट रही है और अपने अपने घर की हालत देखकर वे श्री मोदी की बातों को अपनी कसौटी पर परख रहे हैं। जाहिर है कि इस स्थिति में देश की आबादी का बहुमत अब मोदी के खिलाफ चला जा रहा है क्योंकि वे मान रहे हैं कि एसआईआर के बहाने चुनाव आयोग ने अपनी जिम्मेदारी का ईमानदारी से पालन नहीं किया है।

प्रकाशित रिपोर्ट भी यही बताती है कि ज्ञानेश कुमार का फैसला अल्पमत का था, जिसे जबरन लागू कर दिया गया। अब माहौल बदला तो एसआईआर की समीक्षा करने वाले जजों की यह शिकायत भी बाहर आयी है कि चुनाव आयोग के पोर्टल पर उनकी सीधी पहुंच रोक दी गयी थी। अब तो सुप्रीम कोर्ट ने दूसरों के साथ साथ विवादों में आयी अफसर सीमा खन्ना को भी नोटिस जारी किया है। लिहाजा यह समझा जा सकता है कि आक्रोश की सूनामी को सिर्फ ढकोसलों से अब दबाया नहीं जा सकता।