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समान दूरी वाली सोच अब खत्म हुई बीजद अब इंडिया के साथ

ओडिशा में अब तेजी से बदले सियासी समीकरण

दिल्ली के प्रदर्शन में मौजूद रहा बीजेडी

पहले दोनों गुटों से समदूरी की नीति

दो सांसदों ने इससे इंकार भी किया है

प्रसन्न  महांति

भुवनेश्वरः ओडिशा की राजनीति में करीब 24 वर्षों तक बीजू जनता दल (बीजद) की पहचान का मुख्य आधार रही ‘समदूरी’ (समान दूरी) की नीति अब आधिकारिक तौर पर इतिहास बनती दिख रही है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर इंडिया गठबंधन के मंच पर बीजद की उपस्थिति ने केवल शिरकत नहीं की, बल्कि वर्ष 2029 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर पार्टी की नई राजनीतिक दिशा और रणनीति का खुला ऐलान कर दिया है।

कभी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा रही और नवीन पटनायक के मार्गदर्शन में खुद को भाजपा और कांग्रेस दोनों से समान दूरी पर रखने वाली बीजद ने आखिरकार अपनी उस वैचारिक लक्ष्मण रेखा को पार कर लिया है, जिसे वह अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती थी। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के अनुसार, साल 2024 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों में हार के बाद यह समदूरी की नीति पार्टी के लिए एक राजनीतिक बोझ बन गई थी। यह स्पष्ट संदेश था कि यदि मुख्य मुकाबला भाजपा से है, तो उसके विरोधियों के साथ खड़े होने में संकोच नहीं होना चाहिए।

इस रणनीतिक बदलाव के पीछे राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के दो मुख्य कारण हैं। राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली में विभिन्न मुद्दों पर एनडीए सरकार रक्षात्मक मुद्रा में है और विपक्ष एकजुट होकर हमलावर है। ऐसे समय में इंडिया गठबंधन के मंच पर बीजद की मौजूदगी विपक्ष को एक नया नैतिक बल देती है। वहीं, क्षेत्रीय स्तर पर ओडिशा में मोहन चरण माझी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के गठन के चंद महीनों के भीतर ही प्रशासनिक फैसलों में देरी, संगठन व सरकार के बीच समन्वय की कमी और कानून-व्यवस्था के मुद्दों को लेकर जमीन पर सवाल उठने लगे हैं। बीजद का कैडर पंचायत स्तर तक मजबूत है और वह इस शुरुआती सत्ता विरोधी रुझान को भुनाने का प्रयास कर रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जंतर-मंतर का यह मंच महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि समदूरी के खात्मे और 2029 से पहले ओडिशा में सत्ता में वापसी के लिए बीजद का एक बड़ा सियासी दांव है। हालांकि, बीजद के राज्यसभा सांसदों मानस मंगराज और सुलता देव ने दिल्ली में संयुक्त प्रेस वार्ता कर यह सफाई दी है कि वे न तो इंडिया ब्लॉक में शामिल हुए हैं और न ही एनडीए के साथ हैं, तथा वे अभी भी ‘समदूरी’ की नीति पर कायम हैं। इसके बावजूद, सियासी गलियारों में इस दोहरे रुख को एक बड़ा विरोधाभास माना जा रहा है, क्योंकि मंच और बैनर इंडिया गठबंधन के होने तथा निशाना एनडीए सरकार पर साधे जाने के बाद तटस्थता का दावा करना बीजद की नई राजनीतिक रणनीति को दर्शाता है।