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दूसरे मध्यस्थों के माध्यम से हो रही है कूटनीतिक वार्ता

डोनाल्ड ट्रंप के साफ इंकार के बाद भी कूटनीतिक प्रयास जारी

वाशिंगटनः पश्चिम एशिया में पिछले कई महीनों से जारी विनाशकारी संघर्ष को समाप्त करने के लिए कूटनीतिक स्तर पर एक बार फिर से हलचल तेज हो गई है। अमेरिका और ईरान के अधिकारियों ने इस लंबे संघर्ष को विराम देने के वास्ते एक नए प्रयास के तहत अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों के साथ अलग-अलग दौर की बातचीत की है।

यह नवीनतम कूटनीतिक पहल ऐसे समय में सामने आई है जब युद्ध के कारण वैश्विक बाजारों, ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय स्थिरता पर लगातार गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठकों के दौरान विभिन्न पक्षों के बीच अनौपचारिक संपर्क के बाद, अब मध्यस्थों के माध्यम से एक संशोधित संघर्षविराम प्रस्ताव पर चर्चा को आगे बढ़ाया जा रहा है। हालांकि दोनों देश सीधे तौर पर आमने-सामने बैठकर बातचीत करने से बच रहे हैं, लेकिन तीसरे पक्षों और कूटनीतिक मध्यस्थों के जरिए दूरियां कम करने के प्रयास लगातार जारी हैं।

इस पूरी बातचीत का मुख्य केंद्र ईरान द्वारा पेश किया गया वह संशोधित प्रस्ताव है जिसमें सात दिनों के युद्धविराम और उसके बाद के घटनाक्रमों की रूपरेखा तैयार की गई है। वार्ता से जुड़े करीबी सूत्रों और अधिकारियों का ऐसा कहना है कि इस प्रस्ताव में सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से जहाजरानी के लिए खोलने और क्षेत्र में अवरुद्ध पड़े तेल व्यापार को सुचारू बनाने जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल हैं।

ईरान का यह रुख रहा है कि जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलने का निर्णय वाशिंगटन द्वारा उसकी कुछ प्रमुख शर्तों और प्रस्तावों को स्वीकार किए जाने पर ही निर्भर करता है। इससे पहले भी अप्रैल और जून के महीनों में मध्यस्थों की मध्यस्थता से कुछ समझौतों की रूपरेखा तैयार हुई थी, लेकिन अविश्वास और जमीनी तनाव के चलते वे समझौते ज्यादा समय तक टिक नहीं पाए थे और जल्दी ही बिखर गए थे।

दूसरी ओर, अमेरिकी प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों को लेकर कुछ ठोस रियायतें दे, जिससे एक स्थाई शांति समझौते का मार्ग प्रशस्त हो सके। इस कूटनीतिक प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों का यह भी मानना है कि भले ही दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की खाई बहुत गहरी है, फिर भी बातचीत के दरवाजे खुले रहना इस बात का संकेत है कि कोई भी पक्ष इस अनिश्चितता को अनिश्चितकाल तक खींचना नहीं चाहता।

मध्यस्थ लगातार दोनों देशों के कड़े रुख को नरम करने और एक व्यावहारिक समझौते की जमीन तैयार करने में जुटे हुए हैं। बहरहाल, दुनिया भर की निगाहें इस ताजा मध्यस्थता प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं, क्योंकि इस बात पर बहुत कुछ निर्भर करता है कि क्या यह कूटनीतिक प्रयास इस भीषण युद्ध को रोकने में कामयाब हो पाता है या नहीं।