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क्या गम है जिसको छुपा रहे हो.. .. .. .. ..

भारतीय राजनीति में एक बहुत ही अद्भुत जीव पाया जाता है—जिसे सोशल मीडिया की भाषा में कट्टर समर्थक या प्रेम से अंधभक्त कहा जाता है। इन महाशयों की महिमा अपरंपार है। ये वो जीव हैं जो ऑक्सीजन की कमी पर भी फेफड़ों की मजबूती का सर्टिफिकेट जारी कर सकते हैं। लेकिन इन दिनों इनकी हालत उस बेचारे छोड़े गए पतंग जैसी हो गई है, जिसकी डोर आसमान में तो बंधी है, लेकिन कटने के बाद वो किसी कांटेदार झाड़ी में उलझकर छटपटा रही है।

हाल यह है कि बेचारे समर्थकों के सीने में दर्द तो उठ रहा है, पर मजाल है कि उनकी छाती से एक आह भी बाहर निकल जाए। मजबूरी ऐसी कि मुंह सिले हुए हैं और पुरानी छवि को ढोने के चक्कर में अंदर ही अंदर ऐसे घुट रहे हैं जैसे कुकर में बिना सीटी की दाल जल रही हो। घर की चारदीवारी के अंदर का दृश्य तो और भी भयावह है। चौखट के भीतर रसोई से लेकर ड्राइंग रूम तक महंगाई पर ऐसी रोज़ की किचकिच और घमासान मचता है कि महाभारत का रणक्षेत्र भी फीका पड़ जाए। घर की गृहणी जब महीने का बजट सामने रखती है, तो समर्थक महोदय बाहर निकलकर सोशल मीडिया पर भारतीय अर्थव्यवस्था की ऊंची छलांग और विश्वगुरु बनने के फसाने सुनाने लगते हैं।

अब जरा सरकार के उन चमत्कारी आयोजनों पर गौर फरमाइए, जो आम आदमी की जेब पर सर्जिकल स्ट्राइक करते हैं। मोदी जी के जन्मदिन पर उत्सव मनाने और खुशी में दिए जलाने का ऐसा सरकारी व सामाजिक दबाव होता है कि बेचारे भक्त को अपनी जेब से तेल खरीदकर दीये रोशन करने ही पड़ते हैं। वह मन ही मन हिसाब लगाता है कि यदि यही सरसों या रिफाइंड का तेल चुपचाप रसोई के भगोने में चला जाता, तो अगले दो-तीन महीने तक पकौड़े छनने का संकट टल जाता और घर की शांति भंग होने से बच जाती। लेकिन क्या करें? डिजिटल भारत में भक्ति का दीया बुझना नहीं चाहिए, भले ही घर का चूल्हा ठंडा पड़ जाए।

ऊपर से सोने पर सुहागा यह कि यूपीआई ट्रांजैक्शन पर टैक्स लगाने के सुगबुगाते सरकारी फैसलों का भी अब सोशल मीडिया के इन वीर सिपाहियों को आंख मूंदकर समर्थन करना पड़ रहा है। इंटरनेट पर ऐसे महानुभावों की लंबी फौज है जो इस बात पर भी बड़े-बड़े शोधपत्र लिख रहे हैं कि कैसे हर पेमेंट पर टैक्स लगना देशहित में एक क्रांतिकारी कदम है। इनके पास दुनिया भर के तर्क हैं, बस एक छोटे से सवाल का उत्तर नहीं है—कि आखिर यह जो व्यापारी कर का भुगतान करेगा, वह अपनी पुश्तैनी जमीनों को बेचकर भरेगा या अंत में आम जनता की ही खाल उधेड़कर वसूलेगा?

इसी हालत को देखकर वर्ष 1983 में बनी फिल्म अर्थ का यह गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था कैफी आजमी ने और संगीत में ढालने के बाद खुद ही इसे गाया था जगजीत सिंह ने।

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

क्या गम है जिसको रहे हो

क्या गम है जिसको छुपा रहे हो

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

आँखों में नमी हँसी लबों पर

आँखों में नमी हँसी लबों पर

क्या हाल है क्या दिखा रहे हो

क्या हाल है क्या दिखा रहे हो

क्या गम है जिसको छुपा रहे हो

तुम इतना क्यों मुस्कुरा रहे हो

बन जाएँगे ज़हर पीते पीते

बन जाएँगे ज़हर पीते पीते

यह अश्क जो पीते जा रहे हो

यह अश्क जो पीते जा रहे हो

जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है

जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है

तुम क्यों उन्हे छेड़े जा रहे हो

तुम क्यों उन्हे छेड़े जा रहे हो

क्या गम है जिसको छुपा रहे हो

तुम इतना क्यों मुस्कुरा रहे हो

रेखाओं का खेल है मुक़द्दर

रेखाओं का खेल है मुक़द्दर

रेखाओं से मात खा रहे हो

रेखाओं से मात खा रहे हो

क्या गम है जिसको छुपा रहे हो

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

क्या गम है जिसको छुपा रहे हो

ऐसा लगता है कि दिल्ली के किसी अति-वातानुकूलित और भव्य दफ्तर में बैठकर किसी परम बुद्धिजीवी अफसर ने अचानक यह दिव्य ज्ञान प्रकट कर दिया होगा। बिना यह सोचे कि जमीन पर इसका क्या असर होगा, इसे जीएसटी की तर्ज पर रातों-रात लागू करने की योजना बना ली गई। काश, कोई ऐसा ऐप आ जाता जो इस बात की गारंटी दे सके कि नेताजी की जय-जयकार करने से घर का बिजली बिल और गैस सिलेंडर अपने आप सस्ता हो जाएगा! तब शायद इन बेचारों को अपनी अंतरात्मा और रसोई के बीच यह खूनी संघर्ष न देखना पड़ता।