यह समय जब खराब चलता है, तो मुसीबतें बाई वन, गेट फोर के डिस्काउंट ऑफर की तरह झोली में आ गिरती हैं। एक समस्या को सहलाकर सुलाने की कोशिश करो, तो दूसरी दरवाजा खटखटाने लगती है। देश की राजनीति में इन दिनों कुछ ऐसा ही मौसम बना हुआ है। सत्ता के गलियारों में सन्नाटा कम और सिरदर्द ज्यादा पसर चुका है।
शुरुआत हुई देश के सर्वोच्च न्यायालय के उस एक शब्द से, जो गलती से जुबान से क्या फिसला, मानो राजनीति के फर्श पर अचानक ऑल-आउट छिड़क दिया गया हो। सीजेआई साहब ने तो सहज भाव से तेलचट्टा शब्द का इस्तेमाल किया था, लेकिन किसे पता था कि एक पूरी की पूरी तेलचट्टा पार्टी ही इस शब्द को अपना स्वाभिमान मानकर मैदान में उतर आएगी!
अब आलम यह है कि जिस शब्द को लोग घरों के कोनों में चप्पल से दबाने के लिए ढूंढते थे, वही शब्द आज टीवी डिबेट्स का मुख्य एजेंडा बन गया है। विपक्षी दल कह रहे हैं—हमें तेलचट्टा कहा? हम तो अब आपके फैसलों की बुनियाद ही हिलाकर मानेंगे! सत्तापक्ष रक्षात्मक मुद्रा में यह समझाने में लगा है कि हुजूर, शब्द कीट-विज्ञान से जुड़ा था, राजनीति से नहीं।
अभी इस कीड़े-मकोड़े वाले विवाद की धूल बैठी भी नहीं थी कि राहुल गांधी की छात्रों की गूंज का साउंड सिस्टम बजने लगा। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा क्या हुआ, जैसे पुरानी फाइलों पर जमी धूल हट गई और गड़े मुर्दे एकाएक जिंदा होकर वॉक करने लगे। पेपर लीक, बेरोजगारी, और शिक्षा व्यवस्था में घालमेल के जो मामले ठंडे बस्ते में पड़े थे, वे अचानक मुख्यधारा में तैरने लगे। हर चौराहे पर छात्र हाथ में तख्तियां लिए खड़े हैं और सरकार के कान में बस एक ही आवाज गूंज रही है—अगला नंबर किसका?
परेशानी सिर्फ बाहर से आती तो भी झेल ली जाती, लेकिन असली दर्द तो तब होता है जब अपने ही घर वाले आंखें तरेरने लगें। मंत्रिमंडल के वही सहयोगी, जो कल तक हर बात पर केवल हाजिरी लगाने की मुद्रा में गर्दन हिलाते थे, अब अचानक सिद्धांतों और अधिकारों की बात करने लगे हैं। गठबंधन और अंदरूनी कलह की ऐसी बयार चली है कि भारतीय जनता पार्टी के आधुनिक चाणक्य कहे जाने वाले बड़े नेता भी संसद के गलियारों में अपनी चिर-परिचित मुस्कान खो चुके हैं। जो नेता कभी विपक्ष को अपनी उंगलियों के इशारे पर नचाते थे, वे आज संसद की कैंटीन से लेकर सदन की कार्यवाही तक चेहरा छिपाते नजर आ रहे हैं कि कहीं कोई पत्रकार आकर नया सवाल न दाग दे।
इसी बात पर वर्ष 1988 में बनी फिल्म शिवाशक्ति का एक गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था समीर ने और संगीत में ढाला था आनंद मिलिंद ने। इसे अलका याग्निक और मोहम्मद अजीज ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।
पीछा ना छोड़ूंगी, मर जाऊंगी
सच्ची कहूँ मैं, तोहे काट खाऊंगी!
पीछा ना छोड़ूंगी, मर जाऊंगी
सच्ची कहूँ मैं, तोहे काट खाऊंगी!
ना छेड़ो मुझे, ना सताओ मुझे
है रस्ता अलग, जाने दो मुझे!
ना छेड़ो मुझे, ना सताओ मुझे
है रस्ता अलग, जाने दो मुझे!
ना-ना-ना, ना-ना-ना
जाने ना दूंगी, ना जाने दूंगी!
तेरी कसम तुझे, ना जाने दूंगी
रस्ता तेरा मैं तो, रोक जाऊंगी!
सच्ची कहूँ मैं, तोहे काट खाऊंगी!
पीछा ना छोड़ूंगी, मर जाऊंगी
सच्ची कहूँ मैं, तोहे काट खाऊंगी!
तू कैसी कटीली, तू कैसी हठीली
अरे छोड़ भी दे ज़िद, ओ रे छबीली!
मैं तेरी दीवानी, तू मेरा दीवाना
ना छोड़ूँगी तोहे, ओ मेरे मस्ताना!
तुझे अपना बना के ही मानूंगी
सच्ची कहूँ मैं, तोहे काट खाऊंगी!
पीछा ना छोड़ूंगी, मर जाऊंगी
सच्ची कहूँ मैं, तोहे काट खाऊंगी!
और अगर इतने सब के बाद भी कोई कमी रह गई थी, तो उसे पूरा करने के लिए नव-भक्त ब्रिगेड तो मुस्तैद बैठी ही है! ताजा-ताजा पार्टी की भक्ति में लीन हुए स्वतंत्र भारद्वाज का बड़बोलापन पूरी पार्टी पर ऐसा भारी पड़ा कि समझ नहीं आ रहा रायता समेटा जाए या बर्तन ढका जाए। नए-नए भक्तों का जोश हमेशा चरम पर होता है, लेकिन जब वह जोश बिना किसी विवेक के बयानबाजी में बदल जाए, तो पार्टी के पुराने रणनीतिकार सिर्फ अपना सिर धुनते रह जाते हैं।
सच ही कहा गया है कि जब समय विपरीत होता है, तो हर दांव उल्टा ही पड़ता है। एक तरफ सीजेआई का तेलचट्टा शब्द, दूसरी तरफ राहुल की छात्र-गूंज, तीसरी तरफ धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और ऊपर से गठबंधन के साथियों का ब्लैकमेल—सत्ता के इस रथ के चारों पहिये अलग-अलग दिशा में भाग रहे हैं। परेशानियां पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहीं, और भक्त हैं कि रोज नया फसाद खड़ा करके अपने ही आकाओं की बची-कुची नींद हराम कर रहे हैं।