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सत्ता के गलियारे में फिर से पुरानी अफवाह का जोर

विभाग के तीसरे मंत्री का मंत्रित्व काल में निधन

पहले ही इसके दो मंत्रियों का निधन हुआ है

अब दबी जुबान से मनहूस विभाग की चर्चा

अब कौन इसे सहजता के साथ स्वीकार करेगा

राष्ट्रीय खबर

रांची: झारखंड की राजनीति से एक बेहद दुखद और स्तब्ध कर देने वाली खबर सामने आई है। राज्य सरकार में  शिक्षा, नगर विकास और पर्यटन मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू का दिल का दौरा पड़ने से अचानक निधन हो गया है। गिरिडीह से दो बार झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के विधायक रहे 56 वर्षीय सुदिव्य कुमार मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के बेहद करीबी और संकटमोचक सहयोगियों में गिने जाते थे। उनके असमय निधन से न केवल सत्ताधारी गठबंधन और प्रशासनिक महकमे में शोक की लहर दौड़ गई है, बल्कि राज्य के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग का प्रभार अंधविश्वास और चचार्ओं के केंद्र में आ गया है।

झारखंड में यह पहला मौका नहीं है जब शिक्षा विभाग संभाल रहे किसी कद्दावर मंत्री का कार्यकाल के दौरान ही आकस्मिक निधन हुआ हो। सुदिव्य कुमार सोनू से पहले भी इसी मंत्रालय से जुड़े दो शीर्ष नेताओं की असामयिक मृत्यु हो चुकी है। हेमंत सोरेन सरकार के शुरूआती कार्यकाल में मंत्री रहे पूर्व शिक्षा मंत्री रामदास सोरेन का निधन हो गया था। राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री और टाइगर के नाम से मशहूर जगन्नाथ महतो का अप्रैल 2023 में लंबे इलाज के बाद निधन हो गया था। अब सुदिव्य कुमार सोनू के अचानक चले जाने से इस विभाग की जिम्मेदारी संभालने को लेकर नेताओं और प्रशासनिक महकमे में एक अनजाना संकोच और अंधविश्वास गहराने लगा है।

राजनीतिक हलके में इसे मनहूस प्रभार तक कहा जाने लगा है।  सुदिव्य कुमार सोनू हाल ही में राज्य में छात्रों और अभ्यर्थियों के आंदोलनों के समाधान के लिए बनाई गई कैबिनेट कमेटी का प्रमुख चेहरा थे। जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं में सुधार को लेकर वह लगातार छात्रों से संवाद कर रहे थे। उनके निधन पर दुख व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा, मैंने अपना बड़ा भाई और सच्चा मार्गदर्शक खो दिया है। उनकी कमी को कभी पूरा नहीं किया जा सकेगा। एक के बाद एक तीन-तीन मंत्रियों के असामयिक निधन ने हेमंत सरकार के सामने प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। सोनू के पास नगर विकास और उच्च शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभाग थे। अब सवाल उठ रहा है कि इस अशुभ माने जा रहे विभाग की कमान किसे सौंपी जाएगी और क्या कोई वरिष्ठ नेता इसे सहजता से स्वीकार करेगा?