केदारनाथ हादसे के बाद नेपाल की दूसरी घटना सामने आयी
साढ़े सात हजार से अधिक ऐसे झील हैं
180 से अधिक खतरनाक चिह्नित हैं
सरकारी योजना का अता पता नहीं है
रजत कुमार गुप्ता
रांचीः वैश्विक तापमान में लगातार हो रही वृद्धि (ग्लोबल वॉर्मिंग) और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब भारतीय हिमालयी क्षेत्रों पर गंभीर संकट के रूप में सामने आ रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र और केंद्रीय जल आयोग के हालिया उपग्रह-आधारित अध्ययनों से यह चिंताजनक खुलासा हुआ है कि भारत के प्रमुख हिमालयी राज्यों—हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर (व लद्दाख) तथा अरुणाचल प्रदेश में कुल मिलाकर 7,500 से अधिक ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं।
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वैज्ञानिकों के अनुसार, बढ़ते तापमान के कारण हिमनद (ग्लेशियर) तेजी से पिघल रहे हैं, जिसके कारण न केवल पुरानी झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है, बल्कि नई झीलों का निर्माण भी हो रहा है। इन राज्यों में फैली झीलों में से लगभग 189 से 190 झीलों को अत्यंत संवेदनशील और उच्च जोखिम की श्रेणी में रखा गया है। इन झीलों से ग्लेशियर झील फटने से आने वाली अचानक बाढ़ का गंभीर खतरा बना हुआ है, जो निचले इलाकों और पर्वतीय बस्तियों के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। प्रसिद्ध धार्मिक क्षेत्र केदारनाथ में भी ऐसा हादसा हो चुका है। जिसके बाद हाल में नेपाल में ऐसी घटना घटी है।
हिमाचल प्रदेश में 1,000 से अधिक ग्लेशियर झीलें चिन्हित की गई हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने इनमें से लगभग 48 झीलों को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में शामिल किया है, जहां निरंतर उपग्रह निगरानी की जा रही है। उत्तराखंड राज्य में सैकड़ों छोटी-बड़ी हिमनद झीलें स्थित हैं। इनमें से 13 से 15 प्रमुख झीलें अत्यंत संवेदनशील पाई गई हैं, जो अचानक जलप्रलय का कारण बन सकती हैं।
जम्मू-कश्मीर व लद्दाख में 50 से अधिक तथा लद्दाख के वृहद हिमालयी भूभाग में 130 से अधिक प्रमुख ग्लेशियर झीलें दर्ज हैं। अरुणाचल प्रदेश में स्थित इस राज्य में 181 से अधिक प्रमुख ग्लेशियर झीलें पाई गई हैं, जिनमें से 28 झीलें अति-संवेदनशील और उच्च जोखिम श्रेणी में शामिल हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन टीमों ने इन क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम (पूर्व चेतावनी प्रणाली) स्थापित करने और निगरानी को तीव्र करने की सिफारिश की है, ताकि किसी भी संभावित प्राकृतिक आपदा से जान-माल का सुरक्षात्मक बचाव सुनिश्चित किया जा सके। वैसे दो हादसों का रिकार्ड सामने होने के बाद भी अब तक ऐसे किसी हादसे से बचने की सरकारी कार्ययोजना और तैयारी क्या है, इस बारे में कोई औपचारिक जानकारी नहीं है।