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हेयरकट ने नाम पर जनता का मूंडन क्यों

राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण द्वारा एस्सेल ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा के लिए 6.5 करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान योजना को दी गई मंजूरी ने देश के बैंकिंग और कॉरपोरेट जगत में एक नई और गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। यह निर्णय इसलिए विवादास्पद बन गया है क्योंकि यह स्वीकृत राशि एस्सेल ग्रुप के कुल 99.97 प्रतिशत बकाया कर्ज (जिस पर लगभग 99.97 फीसद कर्ज माफी दी गई है) का महज 0.03 प्रतिशत हिस्सा प्रदर्शित करती है।

यदि इसकी तुलना सुभाष चंद्रा द्वारा दी गई 2,574 करोड़ रुपये की व्यक्तिगत गारंटी से भी की जाए, तो यह वसूली मात्र 0.25 प्रतिशत ही बैठती है। इस एक फैसले ने भारतीय इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड के दस साल के सफल इतिहास, उसकी प्रभावकारिता और उसमें मौजूद नीतिगत खामियों को दोबारा सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है।

वर्ष 2016 में लागू हुई दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता का मूल उद्देश्य भारतीय बैंकिंग प्रणाली को फंसे हुए कर्ज के संकट से उबारना और कंपनियों के समयबद्ध पुनरुद्धार की व्यवस्था करना था। यदि आंकड़ों के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो मार्च 2026 तक की स्थिति के अनुसार आईबीसी ने लेनदारों को स्वीकृत समाधान योजनाओं के माध्यम से लगभग 4.32 लाख करोड़ रुपये की वसूली कराने में मदद की है।

आईबीसी प्रक्रिया के तहत होने वाली यह वसूली परिसमापन मूल्य का लगभग 116.85 प्रतिशत और उचित मूल्य (Fair Value) का 94.56 प्रतिशत रही है, जो इसे पहले के कानूनों की तुलना में अधिक व्यावहारिक और त्वरित बनाती है। इसके अतिरिक्त, औपचारिक रूप से इंसॉल्वेंसी की कार्यवाही में प्रवेश करने से पहले ही 32,000 से अधिक मामलों का निपटारा किया जा चुका है, जिनमें लगभग 14 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति शामिल थी।

ये आंकड़े इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि आईबीसी ने देश में ऋण संस्कृति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन तमाम सफलताओं के बावजूद, सुभाष चंद्रा के मामले में वित्तीय संस्थानों द्वारा स्वीकार किया गया अत्यधिक हेयरकट व्यवस्था के भीतर छिपे बड़े संकट को उजागर करता है।

मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस स्थिति को बैंकों और करदाताओं का मुंडन करार देते हुए तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।  इस निर्णय पर रहस्य इसलिए और गहरा जाता है क्योंकि एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक, केनरा बैंक, आरबीएल बैंक और यूनियन बैंक जैसे भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के प्रमुख दिग्गजों ने इस पुनर्भुगतान योजना का कड़ा विरोध किया था। बैंकों का तर्क है कि जब किसी प्रमोटर ने हजारों करोड़ रुपये के ऋण के बदले अपनी व्यक्तिगत संपत्ति और निष्ठा की गारंटी दी थी, तब महज 6.5 करोड़ रुपये में उसे पूर्ण दायित्वों से मुक्त कर देना न्यायिक व वित्तीय दृष्टि से अनुचित है।

कॉरपोरेट स्तर पर दिए जाने वाले हेयरकट और व्यक्तिगत बकाएदारों के स्तर पर दी जाने वाली छूट के बीच का यह भारी अंतर उस बुनियादी निवारक प्रभाव को कमजोर करता है, जिसे स्थापित करने के लिए आईबीसी का निर्माण किया गया था। एनसीएलटी द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर लगभग पूर्ण ऋण-माफी  को स्वीकार कर लेने से यह गंभीर खतरा पैदा हो गया है कि भविष्य में व्यक्तिगत गारंटी केवल कागजी वादे बनकर रह जाएंगी।

असहमत लेनदारों का मानना है कि सांकेतिक वसूली को मंजूरी देने से वर्तमान में चल रहे अन्य हाई-प्रोफाइल मामलों के समाधान के लिए एक हानिकारक मिसाल कायम होगी। इससे न केवल भविष्य में बैंक प्रमोटरों पर भरोसा करने से हिचकिचाएंगे, बल्कि पूरे बैंकिंग क्षेत्र में ऋण अनुशासन भी बुरी तरह प्रभावित होगा। यदि प्रमोटरों को यह संदेश जाता है कि वे अपनी कंपनियों को दिवालिया बनाकर और खुद मामूली राशि चुकाकर बाहर निकल सकते हैं, तो यह व्यवस्था का दुरुपयोग करने का एक आसान रास्ता बन जाएगा।

यदि सरकार और नियामक निकाय बड़े डिफॉल्टरों के प्रति अपनी कठोर नीति के प्रति वास्तव में गंभीर हैं, तो भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड को अविलंब कदम उठाने होंगे। ऐसे बकाएदारों की अघोषित वैश्विक संपत्तियों की गहन और व्यापक फोरेंसिक ट्रैकिंग शुरू करनी चाहिए। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि कोई भी कॉरपोरेट डिफॉल्टर या प्रमोटर दिवालियापन तंत्र का उपयोग एक भागने के रास्ते के रूप में न कर सके।

आम जनता और करदाताओं के पैसे की कीमत पर प्रमोटरों को बेदाग बाहर निकलने का अवसर नहीं मिलना चाहिए। यदि व्यक्तिगत गारंटियों की साख और आईबीसी के प्रति जन-विश्वास को बचाए रखना है, तो कड़े कानूनी सुधार और पारदर्शी फोरेंसिक जांच समय की सबसे बड़ी मांग है। साथ ही इस किस्म की कर्जमाफी के हेयरकट की संज्ञा देना भी गलत है। आखिर बड़े कर्जदारों की कर्जमाफी पर झूठ बोलकर बार बार यह आर्थिक बोझ देश की जनता पर डालने की जिम्मेदारी भी अब तय होनी चाहिए। सिर्फ तर्क गढ़ने और सफाई देने से जनता का पैसा वापस नहीं आता।