ट्रंप की अदूरदर्शी कूटनीति और अमेरिकी एकांत
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से वैश्विक व्यवस्था के केंद्र में अमेरिका की एकछत्र धौंस और उसका रणनीतिक प्रभुत्व कायम रहा है। डॉलर का वर्चस्व, पेंटागन की अजेय सैन्य शक्ति और अमेरिकी नेतृत्व वाला पश्चिमी खेमा लंबे समय तक वैश्विक राजनीति के ध्रुव बने रहे। लेकिन, हाल के वर्षों में—विशेषकर अमेरिका को फिर से महान बनाने के नारों के साथ सत्ता के गलियारों में लौटे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई नीतियों ने इस दशकों पुरानी साख को गहरे संकट में डाल दिया है।
ट्रंप के ताबड़तोड़ और आक्रामक फैसलों ने वैश्विक कूटनीति में ऐसा भूचाल ला दिया है कि आज अमेरिका अपने पारंपरिक सहयोगियों के बीच भी अकेला और अलग-थलग पड़ता नजर आ रहा है। ट्रंप प्रशासन की विदेश और आर्थिक नीति का मूलमंत्र अमेरिका फर्स्ट रहा है। इस सनक भरे अहंकार में वाशिंगटन ने यह भूल, कि आधुनिक वैश्विक व्यवस्था में कोई भी महाशक्ति पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हो सकती।
सबसे बड़ा आघात अमेरिकी व्यापारिक और रणनीतिक साझेदारों को लगा, जब उन पर मनमाने ढंग से भारी-भरकम टैरिफ थोप दिए गए। भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक और रणनीतिक साझीदार के साथ भी ट्रंप प्रशासन का रवैया बेहद अदूरदर्शी रहा है। भारत पर लगातार अनुचित टैरिफ थोपने, आयात शुल्क को लेकर खुलेआम धौंस जमाने और भारतीय अर्थव्यवस्था के खिलाफ उल्टे-सीधे बयान देने से भारत के राजनीतिक और कूटनीतिक गलियारों में गहरी नाराजगी है।
आज स्थिति यह है कि भारत में मोदी सरकार की रणनीतिक बाध्यताओं को छोड़ दें, तो देश की आम जनता, उद्योग जगत और मीडिया में ट्रंप की छवि एक अविश्वसनीय और मनमाने नेता के रूप में बन चुकी है। भारतीय जनमानस अब अमेरिका को एक भरोसेमंद दोस्त के बजाय एक स्वार्थी महाशक्ति के रूप में देखता है, जो सिर्फ अपने हितों की चिंता करता है। ट्रंप की कूटनीतिक विफलताओं का सबसे बड़ा उदाहरण मध्य पूर्व में देखने को मिला।
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के अत्यधिक दबाव और उकसावे में आकर अमेरिका ने ईरान के खिलाफ जो सैन्य दुस्साहस दिखाया, वह वाशिंगटन के लिए भारी भूल साबित हुआ। ईरान पर सीधे हमले ने न केवल पूरे पश्चिम एशिया को एक महाविनाशक युद्ध की आग में झोंक दिया, बल्कि अमेरिकी सैन्य क्षमता की पोल भी खोल दी।
अंदरखाने से छनकर आ रही खुफिया और सामरिक रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान के खिलाफ इस सैन्य अभियान में अमेरिकी सेना के गोला-बारूद और अत्याधुनिक हथियारों का एक बहुत बड़ा और अमूल्य हिस्सा खर्च हो चुका है। पेंटागन के भंडार में हथियारों की यह भारी कमी ऐसे समय में सामने आई है जब वैश्विक स्तर पर तनाव चरम पर है। ईरान को कुचलने चले अमेरिका को यह अहसास तक नहीं था कि यह जंग उसकी अपनी ही सैन्य और आर्थिक रीढ़ को कमजोर कर देगी। इस हमले के बाद खाड़ी देशों का अमेरिका से मोहभंग हो चुका है।
दूसरी तरफ उसके सबसे बड़े भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी एकजुट होकर एक नई और खतरनाक धुरी बना रहे हैं। आज रूस, चीन और उत्तर कोरिया एक साथ मिलकर अमेरिकी आधिपत्य के खिलाफ चट्टान की तरह खड़े हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और चीन की रणनीतिक साझेदारी पहले से कहीं अधिक प्रगाढ़ हो चुकी है। अब इसमें उत्तर कोरिया का आक्रामक सैन्य समर्थन और तकनीकी सहयोग भी जुड़ गया है। बीजिंग, मास्को और प्योंगयांग का यह त्रिकोण अमेरिकी वैश्विक नीतियों के लिए एक अभूतपूर्व चुनौती बन गया है।
अमेरिका दुनिया भर के देशों पर प्रतिबंध लगाने और धौंस जमाने की अपनी पुरानी आदत से बाहर नहीं निकल पा रहा है, जबकि उसके विरोधी देश चुपचाप अपने आर्थिक और सैन्य नेटवर्क को मजबूत कर रहे हैं। इन तमाम वाकयों का तार्किक और कूटनीतिक निष्कर्ष केवल एक ही निकलता है—वैश्विक स्तर पर अमेरिका अचानक से बुरी तरह अकेला पड़ गया है।
ट्रंप की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और अदूरदर्शी फैसलों ने दुनिया के सबसे ताकतवर देश को कूटनीतिक रूप से एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ से हर रास्ता अनिश्चितता की ओर जाता है। यदि वाशिंगटन ने समय रहते अपनी आक्रामक और सनक भरी नीतियों में बदलाव नहीं किया, तो वह दिन दूर नहीं जब अमेरिकी महाशक्ति का यह सूरज अपनी ही नीतियों की तपिश में हमेशा के लिए अस्त हो जाएगा। इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि जो साम्राज्य पूरी दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचाना चाहता है, उसका अंत हमेशा उसके अपने ही अहंकार के मलबे के नीचे होता है। पूरी दुनिया को यह सारी बातें समझ में तो आ रही हैं पर डोनाल्ड ट्रंप और उनके करीबी इस खतरे को या तो भांप नहीं पा रहे अथवा कुर्सी बचाने के लिए साहसी होने का नाटक करते जा रहे हैं।