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न्याय की प्रतीक्षा में दम तोड़ते सच

भारतीय राजनीति और प्रशासनिक तंत्र में साजिश और जांच का एक अजीबोगरीब रिश्ता रहा है। जब भी सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों या बड़े नीतिगत फैसलों पर संकट के बादल मंडराते हैं, तो अचानक से कोई न कोई सनसनीखेज खुलासा या गिरफ्तारी सुर्खियां बटोरने लगती है। हाल ही में पश्चिम बंगाल के संदर्भ में मुख्यमंत्री के निजी सहायक की हत्या और उसके बाद जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े एक उग्रवादी की महिला मित्र की गिरफ्तारी ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह पैटर्न नया नहीं है, बल्कि यह उस पुरानी पटकथा का हिस्सा लगता है, जिसका उद्देश्य जनमानस का ध्यान असली और ज्वलंत मुद्दों से भटकाना होता है।

मजेदार सच यह भी है कि जांच एजेंसी का कौन सा अधिकारी यह जानकारी दे रहा है, यह हमेशा पर्दे के पीछे रह जाता है। इसी तरह ईडी की तरफ से भी सारी सूचनाएं सूत्रों के हवाले से जारी होती है। जिनका बाद में नतीजा क्या होता है, यह हम सभी देख रहे हैं। पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद मुख्यमंत्री के निजी सहायक की हत्या एक अत्यंत गंभीर घटना थी। उस समय यह मामला राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना, आक्रोश की लहर उठी, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, पुलिस ने एक रहस्यमयी चुप्पी साध ली। हत्या के पीछे के वास्तविक सूत्रधार कौन थे?

यह राजनीतिक रंजिश थी या कोई सोची-समझी साजिश? इन सवालों के जवाब आज भी अंधेरे में हैं। अब, इतने अंतराल के बाद, अचानक एक महिला मित्र की गिरफ्तारी और मुख्यमंत्री की हत्या की साजिश का खुलासा होना कई संदेहों को जन्म देता है। कानून सम्मत साक्ष्य के अभाव में इस कहानी को सिर्फ एक नैरेटिव के रूप में देखा जा रहा है। सवाल यह है कि क्या यह गिरफ्तारी किसी बड़ी साजिश को उजागर करने के लिए है, या महज एक राजनीतिक ढाल है जिसका उपयोग भविष्य की किसी संभावित विफलता को ढकने के लिए किया जाएगा?

जब जांच एजेंसियां ठोस तथ्यों के बजाय पटकथाओं पर काम करने लगती हैं, तो लोकतंत्र का विश्वास डगमगाने लगता है। अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है। बिहार का सृजन घोटाला इसका सबसे सटीक और दुखद उदाहरण है। करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन की हेराफेरी का यह मामला राज्य की नींव हिला देने वाला था। सीबीआई जांच शुरू हुई, उम्मीदें बंधीं, लेकिन अंततः क्या हुआ? चंद छोटे स्तर के कर्मचारियों की गिरफ्तारी के बाद जांच की गति धीमी पड़ गई। आज यह घोटाला किन गलियारों की फाइलों में कैद है और उस धन का अंतिम उपभोगता कौन था, यह एक अनुत्तरित पहेली बन चुका है। बड़े मगरमच्छ हमेशा की तरह जल के भीतर सुरक्षित हैं और छोटी मछलियां कानून के जाल में फंसी हुई हैं।

यह पुराना खेल वास्तव में एक मनोवैज्ञानिक रणनीति है। जब सत्ताधारी दल महंगाई, बेरोजगारी, बिगड़ती कानून-व्यवस्था या प्रशासनिक भ्रष्टाचार जैसे असली मुद्दों पर जवाब देने में अक्षम महसूस करते हैं, तो वे असुरक्षा का ऐसा माहौल रचते हैं जिसमें जनता सुरक्षा के नाम पर तर्क करना छोड़ देती है। हत्या की साजिश की खबरें, विदेशी कनेक्शन या किसी गुप्त उग्रवादी संगठन का नाम आना, आम जनता में खौफ पैदा करने के लिए काफी होता है। इस प्रक्रिया में जो सबसे बड़ा नुकसान होता है, वह है सच्चाई का। जांच प्रक्रिया का राजनीतिकरण न केवल दोषियों को संरक्षण देता है, बल्कि पीड़ित परिवारों के साथ भी अन्याय करता है।

जब साक्ष्य कानून के तराजू में नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ की दृष्टि से तौले जाते हैं, तो न्याय की संभावना ही खत्म हो जाती है। लोकतंत्र में संदेह का अधिकार जनता के पास है, लेकिन उत्तर देने की जिम्मेदारी सरकार और उसकी एजेंसियों की है। पश्चिम बंगाल की घटना हो या सृजन घोटाला, जनता को सिर्फ कहानियों की नहीं, बल्कि तथ्यों की आवश्यकता है। यदि वास्तव में कोई हत्या की साजिश रची जा रही है, तो उसे पारदर्शी तरीके से सामने लाया जाना चाहिए, न कि उसे किसी राजनीतिक सुविधा के अनुसार इस्तेमाल करना चाहिए।

हमें यह समझने की जरूरत है कि जब तक हम असली मुद्दों पर सरकार से सवाल पूछना जारी नहीं रखेंगे, तब तक यह साजिशों का खेल चलता रहेगा। असली मुद्दा आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और प्रशासनिक जवाबदेही है। हमें यह मांग करनी चाहिए कि जांच एजेंसियां अपनी निष्पक्षता सिद्ध करें। जब तक कानून के शासन (Rule of Law) को राजनीतिक चश्मे से अलग नहीं किया जाएगा, तब तक न्याय की उम्मीद एक मृगतृष्णा ही बनी रहेगी। सच को फाइलों में कैद होने से बचाना ही आज की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक चुनौती है। वरना लोगों की आंखों में धूल झोंकने का यह खेल अब पुराना पड़कर पूरी तरह फेल भी हो चुका है।