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ब्रह्मोस के बाद अब आकाश मिसाइल निर्यात

रक्षा कारोबार में भारत अपने पैर पसारने में जुटा है

  • भारत का रक्षा निर्यात बढ़ रहा है

  • ऑपरेशन सिंदूर की सफलता का लाभ

  • चीन के विमानों को मारने में सक्षम

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से कदम बढ़ाते हुए स्वदेशी मिसाइल प्रणालियों का बड़े पैमाने पर निर्यात कर रहा है। ब्रह्मोस के बाद, अब भारत ने देश में ही विकसित विमान और ड्रोन रोधी मिसाइल प्रणाली आकाश के उन्नत संस्करण का निर्यात शुरू कर दिया है।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के पूर्व प्रमुख समीर वी. कामत ने जानकारी दी है कि पूर्व सोवियत संघ के दो गणराज्यों—ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान को नई पीढ़ी की आकाश मिसाइलें आपूर्ति की गई हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से मध्य एशिया के सुरक्षा ढांचे में भारत की रणनीतिक भूमिका और अधिक मजबूत होगी। गौरतलब है कि ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान से पहले, भारत ने पिछले साल पूर्व सोवियत संघ के ही एक अन्य देश आर्मेनिया को सबसे पहले इस खतरनाक मिसाइल प्रणाली की आपूर्ति की थी।

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, आकाश के इस नए संस्करण (आकाश एनजी) को रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर, मल्टी-फंक्शन रडार और बेहद आधुनिक कमांड, कंट्रोल एंड कम्युनिकेशन सिस्टम से लैस किया गया है, जो इसके पुराने वेरिएंट में मौजूद नहीं थे। इन आधुनिक तकनीकों के कारण यह नई मिसाइल बहुत कम ऊंचाई पर उड़ने वाले तेज रफ्तार ड्रोन और लड़ाकू विमानों को भी पलक झपकते ही ट्रैक करके नष्ट करने में सक्षम है।

भारतीय वायुसेना के सूत्रों का दावा है कि आकाश एनजी चीन के जेएच-17 थंडर और यहाँ तक कि पांचवीं पीढ़ी के जे-20 स्टील्थ लड़ाकू विमानों, जो रडार की नजरों से बचने में सक्षम हैं, का मुकाबला करने और उन्हें मार गिराने में पूरी तरह समर्थ है।

इस आधुनिक वायु रक्षा प्रणाली का निर्माण भारत डायनामिक्स लिमिटेड के साथ संयुक्त उद्यम के तहत किया गया है, जबकि एक अन्य सार्वजनिक उपक्रम भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड इसमें सहयोगी की भूमिका निभा रहा है।

दिसंबर 2020 में आंध्र प्रदेश के सूर्यलंका टेस्ट फायरिंग सेंटर में कंबाइंड गाइडेड वेपन्स फायरिंग 2020 एक्सरसाइज के दौरान इस मिसाइल के लगातार सफल परीक्षण किए गए थे, जहां इसने अपने सभी पूर्व-निर्धारित लक्ष्यों को सटीक रूप से भेदा था। इसके बाद जनवरी 2021 में ओडिशा के चांदीपुर में भी इसका सफल परीक्षण हुआ। पिछले चार वर्षों में डीआरडीओ ने इस मध्यम दूरी की मिसाइल में कई और महत्वपूर्ण तकनीकी सुधार किए हैं, जिसके बाद अब यह अंतरराष्ट्रीय बाजारों में धूम मचा रही है।