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कॉर्पोरेट हित की क्रोनोलॉजी कौन बतायेगा

भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था में पिछले कुछ वर्षों से क्रोनोलॉजी (कालक्रम) शब्द काफी चर्चा में रहा है। जब भी देश में कोई बड़ी नीतिगत घोषणा होती है या किसी बड़े कॉर्पोरेट समूह का किसी नए क्षेत्र में प्रवेश होता है, तो आलोचक और आम जनता अक्सर कड़ियों को जोड़ने का प्रयास करते हैं।

अडाणी समूह के व्यावसायिक विस्तार और केंद्र सरकार के नीतिगत फैसलों के बीच के समय-चक्र (टाइमलाइन) को लेकर अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि क्या ये फैसले महज इत्तेफाक हैं या किसी सोची-समझी क्रोनोलॉजी का हिस्सा? आइए, इन प्रमुख घटनाक्रमों के सिलसिलेवार इतिहास और उनकी कड़ियों का विश्लेषण करते हैं।

इस क्रोनोलॉजी की शुरुआत कृषि क्षेत्र से होती है। साल 2020 में केंद्र सरकार द्वारा तीन नए कृषि कानून लाए गए थे। हालांकि, इन कानूनों के पारित होने से पहले ही देश के विभिन्न हिस्सों में निजी क्षेत्र द्वारा बड़े-बड़े आधुनिक अनाज गोदामों का निर्माण शुरू हो चुका था। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने इन कानूनों के खिलाफ एक ऐतिहासिक और लंबा आंदोलन चलाया।

आंदोलनकारियों को विभिन्न मंचों पर आंदोलनजीवी या विदेशी ताकतों से प्रेरित जैसे कई नामों से भी संबोधित किया गया। अंततः, भारी विरोध और लंबी जद्दोजहद के बाद नवंबर 2021 में सरकार ने इन कानूनों को वापस ले लिया। कानून वापस होने के बावजूद, अनाज भंडारण के आधुनिकीकरण की नीति जारी रही।

भारतीय खाद्य निगम ने देश में भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए निजी भागीदारी को बढ़ावा दिया, जिसके तहत अडाणी लॉजिस्टिक्स जैसे बड़े समूहों को आधुनिक साइलो बनाने और उनके संचालन के बड़े ठेके मिले। आलोचकों का तर्क है कि जो काम कृषि कानूनों के जरिए सीधे तौर पर होना था, वह अब सार्वजनिक-निजी भागीदारी के जरिए धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है।

भारतीय मुद्रा (बैंक नोटों) की उम्र बढ़ाने और उनकी सुरक्षा को मजबूत करने के लिए काफी समय से पॉलिमर बैंक नोट्स (प्लास्टिक के नोट) लाने पर विचार चल रहा है। इसी दौरान, देश के शीर्ष औद्योगिक समूहों ने पेट्रोकेमिकल्स और पॉलिमर (प्लास्टिक के कच्चे माल) के क्षेत्र में भारी निवेश की घोषणा की।

अडाणी समूह ने मुंद्रा में बड़े पैमाने पर पेट्रोकेमिकल और डाउनस्ट्रीम पॉलिमर परियोजनाओं की योजना सार्वजनिक की। जब सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि कागजी नोटों के जल्दी फटने और खराब होने के कारण देश में धीरे-धीरे प्लास्टिक या पॉलिमर नोटों का चलन बढ़ाया जा सकता है, तो विपक्ष और विश्लेषकों ने इसे तुरंत कॉर्पोरेट हितों से जोड़कर देखा।

सवाल यह उठाया गया कि क्या प्लास्टिक नोटों की नीति के पीछे इस क्षेत्र में कदम रखने वाले बड़े उद्योगपतियों को भविष्य का बाजार देना है? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सरकार के दौरों और अडाणी समूह के व्यावसायिक हितों के बीच की क्रोनोलॉजी हमेशा से विवादों और चर्चाओं के केंद्र में रही है।

अडाणी समूह की ऑस्ट्रेलिया में कारमाइकल कोयला खदान परियोजना शुरुआत से ही पर्यावरणविदों और राजनीतिक विवादों से घिरी रही। विपक्ष का आरोप था कि इस परियोजना को गति देने और वहां से भारत में कोयला आयात को सुगम बनाने के लिए कूटनीतिक स्तर पर प्रयास किए गए। परमाणु ऊर्जा और यूरेनियम: हाल के वर्षों में, जब इस समूह ने स्वच्छ ऊर्जा और परमाणु उद्योग के सहायक क्षेत्रों में अपनी दिलचस्पी दिखाई, तो उसी दौरान भारत सरकार के उच्च स्तरीय विदेशी दौरों में ऑस्ट्रेलिया के साथ रणनीतिक संबंधों और यूरेनियम आपूर्ति को लेकर महत्वपूर्ण बातचीत हुई।

चूंकि ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम भंडार है, इसलिए इस व्यापारिक और कूटनीतिक घटनाक्रम को भी इसी क्रोनोलॉजी के एक हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। देश के गृह मंत्री अमित शाह अक्सर नागरिकता कानून और एनआरसी के संदर्भ में आप क्रोनोलॉजी समझिए वाक्यांश का इस्तेमाल करते रहे हैं।

लेकिन आज देश की आर्थिक नीतियों को लेकर जनता और विपक्ष यही सवाल सरकार से पूछ रहे हैं। क्या यह महज एक संयोग है कि जिस क्षेत्र में कोई बड़ा कॉर्पोरेट समूह कदम रखता है, सरकार की नीतियां और अंतरराष्ट्रीय समझौते भी उसी दिशा में मुड़ जाते हैं? सरकार और समर्थकों का तर्क है कि देश के विकास, ऊर्जा सुरक्षा और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए बड़े कॉर्पोरेट निवेश की आवश्यकता होती है, और नीतियां देशहित को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं।

हालांकि, लोकतंत्र में पारदर्शिता सबसे अहम है। जब तक नीतियों और कॉर्पोरेट लाभ के बीच के संबंध धुंधले रहेंगे, तब तक क्रोनोलॉजी के ये सवाल उठते रहेंगे और सरकार को इनका जवाब देना होगा। क्योंकि इससे पहले ही देश की जनता देश के बंदरगाह और एयरपोर्टों का हाल देख चुकी है लिहाजा सिर्फ बातों को गोल गोल घूमाने से यह सवाल अप्रासंगिक नहीं हो जाएगा।