Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
Jabalpur News: बरगी बांध में डूबा 46 वर्षीय व्यक्ति; पत्नी और बेटों के सामने हुई मौत, परिवार में कोह... MP Investment: 'अवसरों की धरती है मध्य प्रदेश'; सीएम मोहन यादव ने निवेशकों को दिया साझेदारी का खुला ... Shivpuri News: प्रीति ग्लोबल यूनिवर्सिटी में डी-फार्मा छात्र की संदिग्ध मौत; छत पर फंदे से लटका मिला... Dhar Bhojshala News: भोजशाला में मां सरस्वती की धातु प्रतिमा ले जाने का वीडियो वायरल; एएसआई अधीक्षक ... Indore Crime News: ब्यूटी फ्रेंचाइजी के नाम पर 1.20 करोड़ की ठगी; दिल्ली की कंपनी के दो डायरेक्टर गिर... MP Monsoon Update: मध्य प्रदेश में प्री-मानसून की बारिश; 33 जिलों के लिए यलो अलर्ट, जानें कब आएगा अस... Punjab Labour Welfare: भगवंत मान का बड़ा ऐलान; 10 लाख निर्माण मजदूरों का होगा फ्री पंजीकरण, खत्म होगा... D.K. Shivakumar on Faith: 'न हिंदू धर्म त्याग सकता हूं, न पहचान'; अपनी आस्था को लेकर सीएम शिवकुमार क... Delhi MCD Action: मालवीय नगर अग्निकांड के बाद एक्शन में निगम; अवैध निर्माणों पर बुलडोजर, 100 से ज्या... Dowry Death in Jharkhand: पलामू में खुशबू की संदिग्ध मौत; ससुराल वालों पर दहेज के लिए प्रताड़ना का गं...

छोटा बच्चा जानकर हमसे ना टकराना रे.. .. ..

वाह! क्या दौर आ गया है। अब अदालतों में भी एंटोमोलॉजी (कीट-विज्ञान) की क्लास लगने लगी है। बस, फर्क इतना है कि वहां कॉकरोच और परजीवी जैसे शब्दों का इस्तेमाल जीव विज्ञान की किताबों के लिए नहीं, बल्कि इस देश के भविष्य यानी युवाओं के लिए किया जा रहा है। और ये युवा भी कमाल हैं, उन्होंने इस डिग्री को सीने से लगाने के बजाय, जंतर-मंतर पर बैठकर इसे अपनी सफलता का तमगा बना लिया है।

कहानी शुरू हुई थी शीर्ष अदालत के उस गलियारे से, जहाँ सीजेआई ने किसी दूसरे संदर्भ में युवाओं को तेलचट्टा (कॉकरोच) और परजीवी कह दिया। जाहिर है, मजाक का स्तर इतना ऊंचा था कि जमीन पर खड़े युवाओं को समझ ही नहीं आया कि वे हंसें या अपनी जड़ों में कीटनाशक छिड़कें। अब युवा भी ठहरे डिजिटल युग की संतान! उन्होंने इस उपमा को सिस्टम एरर मानकर सुधारने की ठान ली। सोशल मीडिया पर #मैं_भी_तेलचट्टा जैसे ट्रेंड चले और देखते ही देखते मजाक का यह बुलबुला जंतर-मंतर के बड़े आंदोलन में तब्दील हो गया। अब सरकार की सांस फूल रही है और समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें।

अब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान जी को ही ले लीजिए। बेचारे इतने दिनों से फाइलों में उलझे थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि उनके मंत्रालय के बाहर कीट-पतंगे जमा हो गए हैं। मांग एक ही है—इस्तीफा! हालांकि, सत्ता के गलियारों में इस्तीफा शब्द अब पुरानी डिक्शनरी का हिस्सा हो चुका है। भाजपा के रणनीतिकारों ने सोचा कि इसे विपक्ष की साजिश बताकर या युवाओं का भटकाव कहकर शांत कर देंगे। उन्होंने खूब जोर लगाया—टीवी डिबेट्स में एक्सपर्ट्स बैठाए गए, फेसबुक पर आईटी सेल ने एंटी-नेशनल का तमगा बांटना शुरू किया। लेकिन नतीजा? जितना ज्यादा तेलचट्टों पर हिट (कीटनाशक) मारा गया, वे उतने ही अधिक निडर होकर बाहर निकलने लगे।

हकीकत तो यह है कि सत्ता को यह समझ नहीं आ रहा कि यह विरोध केवल डिग्री या परीक्षा के बारे में नहीं है। यह उन युवाओं का आत्मसम्मान है, जिन्हें बरसों से भविष्य कहकर चने के झाड़ पर चढ़ाया गया और जब वे जमीन पर उतरे, तो उन्हें परजीवी बता दिया गया।

इसी बात पर 1996 में आई फिल्म मासूम। इसे देव कोहली ने लिखा था और आनंद राज आनंद ने संगीत में ढाला था। इसे आदित्य नारायण ने अपना स्वर दिया था। यह गीत एक शरारती और नटखट अंदाज़ में फिल्माया गया है, जहाँ बच्चा अपनी मासूमियत के पीछे छिपी चालाकी का प्रदर्शन करते हुए बड़ों को चुनौती देता है। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

भोली सूरत जान के, हमसे ना टकराना रे,

डूबी-डूबी डब-डब, डूबी-डूबी डब-डब,

ना धिन धिन्ना, ना धिन धिन्ना,

नाच नचा देंगे, छोटा बच्चा जान के..

छोटा बच्चा जान के हमको ना समझाना रे

छोटा बच्चा जान के हमसे ना टकराना रे

हम तो हैं इस दुनिया के थोड़े से दीवाने

छोटा बच्चा जान के हमसे ना टकराना रे

अरे हम जो भी करेंगे वो तो कमाल करेंगे

जो हमसे उलझेगा उसका बुरा हाल करेंगे

नाच नचा देंगे… ओ नाच नचा देंगे

तुमको सारे ज़माने में

छोटा बच्चा जान के हमसे ना टकराना रे

हम तो सीधे-साधे दिखते हैं

पर काम बहुत ही करते हैं

बड़े-बड़े लोगों के हम पसीने छुड़ा देते हैं

छोटा बच्चा जान के हमसे ना समझाना रे

छोटा बच्चा जान के हमसे ना टकराना रे

डूबी-डूबी डब-डब, डूबी-डूबी डब-डब

वैसे भी, इतिहास गवाह है कि जब-जब शासकों ने जनता को कीड़ा-मकोड़ा समझा है, तब-तब उन कीड़ों ने चट्टानों को खोखला कर दिया है। सरकार शायद अभी भी पुराने फॉर्मूले पर चल रही है—दबाओ, डराओ और दरकिनार करो। उन्हें यह नहीं पता कि यह डिजिटल पीढ़ी है। ये अपनी बात को सिर्फ लाउडस्पीकर पर नहीं, बल्कि एल्गोरिदम के जरिए दुनिया के हर कोने तक पहुंचा रहे हैं।

धर्मेंद्र प्रधान जी अब भी अपनी कुर्सी की पेटी बांधे बैठे हैं। उन्हें लग रहा है कि यह तूफान भी चार दिनों का है। लेकिन, जंतर-मंतर की तपती धूप में खड़े ये युवा बता रहे हैं कि अबकी बार मजाक भारी पड़ गया है। यह आंदोलन अब सिर्फ इस्तीफा मांगने का जरिया नहीं, बल्कि इस बात का ऐलान है कि—युवाओं को परजीवी कहना बंद करो, क्योंकि अगर ये तेलचट्टे अपनी पर आ गए, तो सत्ता का पूरा फर्नीचर चाट जाएंगे।

अंत में बस यही कह सकते हैं कि कुर्सी पर बैठे साहबान, जरा संभल कर! अगर इन छोटों को ज्यादा हल्के में लिया, तो आपकी फाइलों के पन्नों पर ये तेलचट्टे कुछ ऐसी इबारत लिख देंगे, जिसे इतिहास भी नहीं मिटा पाएगा। और हां, कीटनाशक थोड़ा संभल कर छिड़किएगा, कहीं खुद की कुर्सी का पाया ही न गल जाए!