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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दायर याचिका पर सुनवाई से किया इनकार

याचिकादाता से कहा कर्नाटक हाईकोर्ट जाइये

  • याचिकादाता कर्नाटक का निवासी है

  • अदालतों का अपना क्षेत्राधिकार होता है

  • एस विग्नेश शिशिर की है यह याचिका

राष्ट्रीय खबर

लखनऊः इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बुधवार को एक आपराधिक जनहित याचिका को सुनने से इनकार कर दिया। यह याचिका कॉकरोच जनता पार्टी और उसके संस्थापक अभिजीत दिपके की गतिविधियों की गहन जांच के लिए दायर की गई थी। याचिकाकर्ता, एस. विग्नेश शिशिर, जो कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी के एक कार्यकर्ता हैं, ने इस जनहित याचिका के माध्यम से राष्ट्रीय जांच एजेंसी और प्रवर्तन निदेशालय से मामले की व्यापक जांच कराने की मांग की थी।

न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए तकनीकी आधार पर याचिका को स्वीकार करने से मना कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता कर्नाटक के बेंगलुरु का स्थायी निवासी है। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि ऐसे में उचित यह होता कि याचिकाकर्ता सबसे पहले अपनी शिकायत लेकर कर्नाटक उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाता।

अदालत ने अधिकार क्षेत्र संबंधी नियमों का पालन करने की आवश्यकता पर जोर दिया। हालांकि याचिका में कॉकरोच जनता पार्टी और उसके संस्थापक के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए थे, लेकिन अदालत ने याचिकाकर्ता के मूल निवास स्थान और घटनाक्रम के भौगोलिक संदर्भ को देखते हुए इसे इस पीठ के अधिकार क्षेत्र से बाहर माना।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, जनहित याचिकाओं में याचिकाकर्ता का संबंधित क्षेत्राधिकार की अदालत में जाना आवश्यक होता है ताकि अनावश्यक रूप से विभिन्न न्यायालयों पर भार न पड़े। इस फैसले के बाद अब यह देखना बाकी है कि याचिकाकर्ता आगे क्या कानूनी कदम उठाता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ द्वारा खारिज की गई जनहित याचिका में कॉकरोच जनता पार्टी और उसके संस्थापक अभिजीत दिपके पर देश की युवा पीढ़ी को निशाना बनाने और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने का गंभीर आरोप लगाया गया था।

याचिकाकर्ता, एस. विग्नेश शिशिर, ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि यह एक सुनियोजित इंजीनियर्ड डिजिटल कैंपेन (इंजीनियरिंग के माध्यम से तैयार डिजिटल अभियान) है। याचिका के अनुसार, इस अभियान की शुरुआत भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्य कांत की हालिया न्यायिक टिप्पणियों के बाद हुई। याचिका में दावा किया गया है कि: यह अभियान विशेष रूप से देश की जेन-जेड पीढ़ी को निशाना बना रहा है। विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सएप, टेलीग्राम, सिग्नल और ट्विटर/एक्स पर कई खाते संचालित किए जा रहे हैं। इन खातों के माध्यम से न केवल युवाओं में असंतोष की भावना पैदा की जा रही है, बल्कि उन्हें सार्वजनिक अव्यवस्था फैलाने और भारत की वैध सरकार के प्रति घृणा व विद्रोह की भावना भड़काने के लिए उकसाया जा रहा है।

अदालत ने इस याचिका को मेरिट पर सुनने के बजाय क्षेत्राधिकार के आधार पर अस्वीकार कर दिया। न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को सबसे पहले कर्नाटक उच्च न्यायालय में अपनी शिकायत दर्ज करनी चाहिए, क्योंकि वे बेंगलुरु के निवासी हैं। इस मामले ने सोशल मीडिया के माध्यम से चलाए जा रहे राजनीतिक अभियानों और उनकी जवाबदेही को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है, जहाँ डिजिटल प्लेटफॉर्मों का उपयोग करके जनमत को प्रभावित करने और वैचारिक संघर्ष पैदा करने की चिंताएं बढ़ रही हैं।