अदालती अंधकार या चुनावी शुचिता का मार्ग?
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारतीय निर्वाचन आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण अभ्यास को संवैधानिक मान्यता दिए जाने के बाद देश में एक नया राजनीतिक और कानूनी बवंडर खड़ा हो गया है। एक तरफ जहां शीर्ष अदालत ने इसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक अनिवार्यताओं को आगे बढ़ाने वाला कदम बताया है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों और नागरिक समाज के एक्टिविस्टों ने इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बेहद चिंताजनक मोड़ करार दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने चुनावी शुचिता बनाम नागरिक अधिकारों के बीच की बहस को एक बार फिर मुख्यधारा में ला खड़ा किया है। सुप्रसिद्ध अधिवक्ता प्रशांत भूषण का यह बयान कि यह फैसला न्यायपालिका के लिए एक अंधकारमय दिन है, उस गहरी चिंता को रेखांकित करता है जो वर्तमान में संस्थागत निष्पक्षता को लेकर उठ रही है।
आलोचकों का तर्क है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले के जरिए निर्वाचन आयोग को एक तरह से ब्लैंक चेक यानी असीमित अधिकार सौंप दिया है। सबसे बड़ा सवाल प्रक्रिया की टाइमिंग और उसकी नीयत पर उठाया जा रहा है। जब यह अभ्यास आम चुनावों के ठीक मुहाने पर खड़े होकर किया जाता है, तो इसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजिमी है।
कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने बिल्कुल सही बिंदु उठाया कि अतीत में भी ऐसी प्रक्रियाएं होती रही हैं, लेकिन उनका दायरा और समयसीमा (लगभग चार वर्ष) अलग होती थी ताकि किसी भी नागरिक का अधिकार न छूटे। परंतु, वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यकाल में जिस तीव्र गति से और चुनावों के ऐन पहले इसे लागू किया गया, उसने इसके पीछे की राजनीतिक मंशा पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
इस पूरे विवाद का सबसे दर्दनाक और गंभीर पहलू समाज के कमजोर और वंचित वर्गों का डीनफ़्रैंचाइज़ेशन (मताधिकार से वंचना) है। तेलंगाना के एमएलसी प्रोफेसर एम. कोदंडराम ने इस दर्द को बड़ी शिद्दत से बयां किया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक गरीब, दलित, आदिवासी या अल्पसंख्यक नागरिक के पास अपनी आवाज उठाने और सरकार से सौदेबाजी करने का एकमात्र हथियार उसका वोट ही होता है।
यदि बिना किसी पुख्ता और पारदर्शी प्रक्रिया के उसका नाम मतदाता सूची से गायब कर दिया जाए, तो वह अपनी ही सरजमीं पर नागरिकता विहीन और बेबस हो जाता है। पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम और अन्य क्षेत्रों से आ रहे आंकड़े बेहद डराने वाले हैं। यदि पूरक सूचियों से हटाए गए नामों में एक बहुत बड़ा प्रतिशत किसी खास अल्पसंख्यक समुदाय या मतुआ जैसे हाशिए के समुदायों का है, तो प्रक्रिया की तटस्थता पर उंगलियां उठना स्वाभाविक है।
फॉर्म-7 का कथित तौर पर चयनात्मक उपयोग करके जिस तरह से नाम हटाने की शिकायतें आई हैं, वे चुनावी प्रबंधन की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाती हैं। इस विमर्श पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की प्रतिक्रिया बेहद आक्रामक और ध्रुवीकरण करने वाली रही है। भाजपा प्रवक्ताओं द्वारा विपक्ष के इस विरोध को राष्ट्र विरोधी कृत्य करार देना और विपक्षी नेताओं पर अवैध घुसपैठियों का साथ देने का आरोप लगाना, एक गंभीर संवैधानिक विमर्श को विशुद्ध राजनीतिक अखाड़े में बदलने जैसा है।
चुनावी सूचियों को साफ-सुथरा और त्रुटिहीन बनाना निश्चित रूप से एक सराहनीय और आवश्यक कदम है। किसी भी लोकतंत्र में अवैध मतदाताओं या फर्जी नामों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। लेकिन, शुद्धिकरण के इस अभियान में यदि देश का वैध नागरिक पिसने लगे, तो वह व्यवस्था की विफलता मानी जाएगी।
तेलंगाना भाजपा के दावों के विपरीत, यदि इस प्रक्रिया का असर सीधे तौर पर चुनावों के नतीजों और खास समुदायों की भागीदारी पर पड़ रहा है, तो विपक्ष का इस पर सवाल उठाना उसका लोकतांत्रिक कर्तव्य है, न कि कोई राष्ट्रविरोधी कृत्य। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय अंतिम है और उसका सम्मान होना ही चाहिए, क्योंकि अदालत ने इसे संवैधानिक दायरे में पाया है।
लेकिन कानून की वैधता और जमीन पर उसके क्रियान्वयन की नैतिकता में अंतर होता है। निर्वाचन आयोग एक स्वायत्त संस्था है और उसे न केवल निष्पक्ष होना चाहिए, बल्कि उसका निष्पक्ष दिखना भी उतना ही आवश्यक है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि जो खुली आंखों से दिख रहा है, उसे सत्य ना स्वीकारा जाए।
यदि देश के एक बड़े हिस्से में यह धारणा बलवती हो रही है कि आयोग पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर काम कर रहा है, तो यह हमारे लोकतांत्रिक ऊतकों के लिए एक खतरनाक संकेत है। पूरा चुनाव आयोग ही संदेह के घेरे में आ चुका है। भविष्य में ऐसी किसी भी विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को अपनाते समय अत्यंत पारदर्शिता, पर्याप्त समय और राजनीतिक दलों की आम सहमति को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। लोकतंत्र तभी जीवित रहेगा जब हर वैध नागरिक को यह भरोसा होगा कि उसका वोट सुरक्षित है और उसकी आवाज मायने रखती है।