वैज्ञानिकों का दावा दिमाग के बूढ़े होने की प्रक्रिया बदल दी गयी
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उम्रजनित रोगों के लिए कारगर उपचार
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इवी नामक सुक्ष्म कणों पर निर्भर ईलाज
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सीधे दिमाग के टिश्यू तक दवा पहुंच गयी
राष्ट्रीय खबर
रांचीः टेक्सास एएंडएम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने मस्तिष्क की सूजन (इन्फ्लेमेशन) को कम करने के लिए डिज़ाइन किए गए एक साधारण नेज़ल स्प्रे के ज़रिए दिमाग के बूढ़े होने की प्रक्रिया को उलटने का तरीका खोज लिया है। एक नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने बताया कि इस उपचार की मात्र दो खुराक के बाद याददाश्त वापस आ गई, पुरानी सूजन कम हो गई और मस्तिष्क कोशिकाओं के कामकाज में सुधार देखा गया।
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यह अध्ययन इंस्टीट्यूट फॉर रीजेनरेटिव मेडिसिन के एसोसिएट डायरेक्टर और यूनिवर्सिटी के प्रतिष्ठित प्रोफेसर डॉ. अशोक शेट्टी, वरिष्ठ अनुसंधान वैज्ञानिक डॉ. मधु लीलावती नारायण और डॉ. महीधर कोडाली के नेतृत्व में किया गया, जो जर्नल ऑफ एक्सट्रासेल्यूलर वेसिकल्स में प्रकाशित हुआ है। डॉ. शेट्टी ने कहा, डिमेंशिया जैसी उम्र से जुड़ी बीमारियां दुनिया भर में एक बड़ी स्वास्थ्य चिंता हैं। हम यह दिखा रहे हैं कि मस्तिष्क के बूढ़े होने को उलटा जा सकता है।
यह थेरेपी एक्सट्रासेल्यूलर वेसिकल्स (ईवी) नामक सूक्ष्म जैविक कणों पर निर्भर करती है। ये सूक्ष्म संरचनाएं स्वाभाविक रूप से कोशिकाओं के बीच आनुवंशिक सामग्री का परिवहन करती हैं। इस शोध में, उन्हें माइक्रोआरएनए से लोड किया गया था, जो मस्तिष्क में महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करने में मदद करते हैं।
शोधकर्ताओं ने नेज़ल स्प्रे के माध्यम से ईवीएस को सीधे मस्तिष्क तक पहुँचाया, जिससे यह उपचार मस्तिष्क की सुरक्षात्मक दीवार (ब्लड-ब्रेन बैरियर) को पार कर सीधे ब्रेन टिश्यू में चला गया। डॉ. कोडाली ने बताया कि यह इंट्रानेजल डिलीवरी बिना किसी चीर-फाड़ वाली प्रक्रिया के सीधे मस्तिष्क तक पहुँचने और उसका इलाज करने में मदद करती है।
इस उपचार ने न केवल सूजन को कम किया, बल्कि कोशिकाओं के भीतर ऊर्जा पैदा करने वाले माइटोकॉन्ड्रिया की गतिविधि को भी बहाल किया। डॉ. नारायण ने कहा, हम ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करके और माइटोकॉन्ड्रिया को पुनर्जीवित करके न्यूरॉन्स को उनकी ऊर्जा वापस दे रहे हैं।
बिहेवियरल टेस्टिंग से पता चला कि उपचार पाने वाले मॉडलों ने याददाश्त और पहचान से जुड़े कार्यों में काफी बेहतर प्रदर्शन किया। वे परिचित वस्तुओं को पहचानने और अपने परिवेश में बदलावों का पता लगाने में अधिक सफल रहे। सबसे खास बात यह रही कि इसके प्रभाव तेज़ी से दिखे और केवल दो खुराकों के बाद महीनों तक बने रहे। डॉ. शेट्टी के अनुसार, भविष्य में यह थेरेपी स्ट्रोक के मरीजों को ठीक होने में या उम्र बढ़ने से जुड़ी मानसिक गिरावट को धीमा करने में मदद कर सकती है।
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