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डेढ़ सौ सीटों के परिणाम इससे बदल गये

चुनाव आयोग के एसआईआर की भूमिका स्पष्ट हो गयी

  • आंकड़ों का विश्लेषण इसे स्पष्ट करता है

  • उच्चतम न्यायालय ने चिंता जतायी थी

  • मतदाता सूची में जबर्दस्त बदलाव

रजत कुमार गुप्ता

रांचीः लोकतंत्र में प्रत्येक मत की अपनी महत्ता होती है, विशेषकर उन चुनावों में जहाँ जीत और हार का अंतर बेहद कम हो। हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के आंकड़ों का गहन विश्लेषण एक चौंकाने वाला तथ्य सामने लाता है। चुनाव आयोग द्वारा किए गए विशेष गहन संशोधन ने न केवल मतदाता सूची का शुद्धिकरण किया, बल्कि कई मायनों में चुनावी परिणामों की दिशा भी तय कर दी।

निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव से ठीक पहले चलाए गए इस अभियान के तहत रिकॉर्ड 90.66 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए। यह राज्य की कुल मतदाता आबादी का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा था। विलोपन की इस प्रक्रिया को दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया था। लगभग 58.2 लाख नाम अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और विस्थापित श्रेणियों के तहत हटाए गए। लगभग 27 लाख अतिरिक्त मतदाताओं को न्यायिक अधिकारियों द्वारा अंडर एडजुडिकेशन श्रेणी के तहत अयोग्य पाया गया।

दिलचस्प बात यह है कि इस भारी कटौती के मुकाबले 28 फरवरी 2026 तक प्रकाशित अंतिम सूची में केवल 1.88 लाख नए मतदाताओं को जोड़ा जा सका। इससे कुल मतदाता आधार 7.66 करोड़ से घटकर लगभग 7.04 करोड़ रह गया।

आंकड़े बताते हैं कि एसआईआर केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं थी। पश्चिम बंगाल की कुल 294 सीटों में से 150 निर्वाचन क्षेत्रों में हटाए गए मतदाताओं की संख्या, वहां के अंतिम विजय अंतर से अधिक थी। यह आंकड़ा बहुमत के आंकड़े (148) को पार कर जाता है, जो यह संकेत देता है कि यदि ये नाम सूची में होते, तो चुनावी परिणाम बिल्कुल भिन्न हो सकते थे।

विशेष रूप से, उन 169 सीटों पर जहाँ 25,000 से अधिक नाम हटाए गए थे, 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने 128 सीटें जीती थीं। 2026 के चुनाव में, भाजपा ने इन हाई-डिलिशन क्षेत्रों में जबरदस्त सेंधमारी करते हुए अपनी सीटों की संख्या 104 तक पहुँचा दी, जबकि टीएमसी घटकर 63 पर आ गई।

इस प्रक्रिया की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुँचा। सुनवाई के दौरान जस्टिस जयमाल्य बागची ने टिप्पणी की थी कि यदि जीत का अंतर 2 फीसद हो और सूची से हटाए गए मतदाताओं की संख्या 15 प्रतिशत हो, तो न्यायालय को निश्चित रूप से इस पर विचार करना होगा। हालांकि, आयोग ने दलील दी कि यह प्रक्रिया फर्जी और अवैध घुसपैठियों के नाम हटाने के लिए आवश्यक थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, हटाए गए कुल नामों में से 63 फीसद हिंदू और 34 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय से थे। मुस्लिम आबादी (27 प्रतिशत) के अनुपात में उनका 34 फीसद विलोपन दर विशेष रूप से चर्चा का विषय बना। सीमावर्ती जिलों जैसे मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर में विलोपन की दर सबसे अधिक रही। अंततः, भाजपा की 207 सीटों की ऐतिहासिक जीत के पीछे इस वोटर लिस्ट क्लीन-अप ने एक अभूतपूर्व पृष्ठभूमि तैयार की, जिसने बंगाल की सत्ता का संतुलन पूरी तरह से बदल दिया।