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विरोध और उकसावे के बीच बड़ा अंतर होता है

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ याचिका खारिज की

  • वर्ष 2025 के बयान का मामला

  • हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

  • आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा भी है

राष्ट्रीय खबर

लखनऊः इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कांग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ राजद्रोह के आरोपों में प्राथमिकी दर्ज करने की मांग वाली जनहित याचिका को कल को खारिज कर दिया। अदालत ने इस मामले में राहुल गांधी को बड़ी राहत देते हुए स्पष्ट किया कि वैचारिक विरोध और विद्रोह के लिए उकसाने के बीच एक बहुत बड़ा और स्पष्ट अंतर होता है।

विवाद की शुरुआत साल 2025 में हुई थी, जब एक पार्टी कार्यालय के उद्घाटन के दौरान राहुल गांधी ने अपने संबोधन में कहा था, हम भाजपा, आरएसएस और भारत सरकार के खिलाफ लड़ रहे हैं। उनके इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया हुई और विवाद खड़ा हो गया। सिमरन गुप्ता नामक महिला ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर कर तर्क दिया कि राहुल गांधी की टिप्पणी देश की जनता की भावनाओं को आहत करती है और यह सीधे तौर पर राजद्रोह के समान है। याचिकाकर्ता का दावा था कि यह बयान जानबूझकर देश में अशांति फैलाने और विद्रोह को उकसाने के लिए दिया गया था।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान ने लोकतंत्र में आलोचना के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा, सरकार के कार्यों या नीतियों की आलोचना करना लोकतंत्र में न केवल अनुमत है, बल्कि अनिवार्य भी है। इसलिए, आलोचना या मतभेद को अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने आगे कहा कि इस मामले में एक निर्वाचित प्रतिनिधि केवल किसी विशेष नीति या विचारधारा के खिलाफ लड़ने का संकल्प व्यक्त कर रहा है। इसे किसी भी तरह से सरकार के खिलाफ विद्रोह के रूप में नहीं देखा जा सकता।

इससे पहले, याचिकाकर्ता ने संभल की एक अदालत में भी यही मामला उठाया था, लेकिन वहां भी एफआईआर दर्ज करने की मांग खारिज कर दी गई थी। इसके बाद संभल अदालत के फैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान ने 8 अप्रैल को राज्य सरकार और याचिकाकर्ता के वकीलों की दलीलें सुनने के बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था। शुक्रवार को अपने अंतिम फैसले में अदालत ने याचिका को पूरी तरह से आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।