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अभिषेक बनर्जी को राहुल गांधी ने फोन किया

दिल्ली में सरकार को परास्त करने के बाद राजनीति तेज

  • टीएमसी के कई सांसद प्रचार में व्यस्त थे

  • खडगे ने डेरेक ओब्रायन की सराहना की

  • ममता और अखिलेश के बीच भी वार्ता

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्लीः लोकसभा में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों के गिरने के बाद राष्ट्रीय राजनीति में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच नजदीकियां बढ़ती दिख रही हैं। राजनीतिक गलियारों में उस समय हलचल तेज हो गई जब राहुल गांधी ने खुद फोन कर अभिषेक बनर्जी से बात की। वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने डेरेक ओब्रायन और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने ममता बनर्जी से फोन पर चर्चा की। विपक्षी खेमे की इस सक्रियता पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखा कटाक्ष करते हुए इसे दिल्ली में दोस्ती और बंगाल में कुश्ती करार दिया है।

चुनाव प्रचार में व्यस्त होने के कारण अटकलें लगाई जा रही थीं कि क्या तृणमूल सांसद वोटिंग के समय सदन में मौजूद रहेंगे। हालांकि, अभिषेक बनर्जी और कुछ अन्य सांसदों की अनुपस्थिति के बावजूद, सदन में मौजूद टीएमसी सांसदों ने विधेयक के खिलाफ मतदान किया। विपक्षी एकजुटता के कारण पिछले 12 वर्षों में यह पहली बार हुआ जब मोदी सरकार का कोई संवैधानिक संशोधन विधेयक लोकसभा में गिर गया। सूत्रों के अनुसार, राहुल गांधी ने अभिषेक बनर्जी को फोन कर इस विधायी जीत में टीएमसी की महत्वपूर्ण भूमिका के लिए धन्यवाद दिया। वहीं, खड़गे ने सदन में समन्वय के लिए डेरेक ओब्रायन की सराहना की।

शुक्रवार रात सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अभिषेक बनर्जी ने सरकार पर निशाना साधते हुए लिखा, लोकसभा में परिसीমন विधेयक का गिरना भाजपा की घबराहट को सार्वजनिक कर चुका है। इंडिया गठबंधन ने 131वें संशोधन विधेयक को खारिज कर दिया है। यह स्पष्ट है कि एनडीए सरकार अब उधार के समय पर चल रही है। उनके नियंत्रण का भ्रम अब टूट रहा है। सूत्रों का दावा है कि अभिषेक ने राहुल गांधी से बातचीत के दौरान यह भी कहा कि राष्ट्रीय राजनीति में अब हवा भाजपा के खिलाफ बहने लगी है।

विपक्षी नेताओं की इस जुगलबंदी पर भाजपा ने हमला बोला है। भाजपा नेताओं का कहना है कि दिल्ली में एक-दूसरे को बधाई देने वाले ये दल बंगाल में एक-दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरते हैं, जो जनता के साथ धोखा है। भाजपा के अनुसार, यह गठबंधन केवल सत्ता की खातिर बना है और इसमें वैचारिक समानता का अभाव है। बहरहाल, विधेयकों के गिरने और विपक्षी नेताओं के बीच बढ़ते संवाद ने आगामी आम चुनाव की बिसात बिछा दी है।