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तटस्थ नजर नहीं आता चुनाव आयोग

एक पुरानी कहावत है कि ईमानदारी सिर्फ अंदर की बात नहीं है, यह आचरण में साफ साफ नजर भी आना चाहिए। इस कसौटी पर देश का चुनाव आयोग पूरी तरह विफल हो गया है। उसके हर फैसले यह संकेत दे रहे हैं कि वह अपनी सोच के तहत मोदी सरकार की आवश्यकताओं को पूर्ण करने की दिशा में सारे फैसले ले रही है।

भारत में चुनावों को लोकतंत्र का महापर्व कहा जाता है, और इस पर्व को सुचारू एवं निष्पक्ष रूप से संपन्न कराने की जिम्मेदारी भारत निर्वाचन आयोग के कंधों पर होती है। लेकिन आगामी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले आयोग द्वारा नौकरशाही में किए गए व्यापक फेरबदल ने एक नई राजनीतिक बहस और विवाद को जन्म दे दिया है।

सवाल यह उठ रहा है कि क्या निर्वाचन आयोग की सक्रियता केवल गैर-भाजपा शासित राज्यों तक ही सीमित है? गत 8 अप्रैल को निर्वाचन आयोग ने एक बड़ा कदम उठाते हुए तमिलनाडु के मुख्य सचिव एन. मुरुगनंदन और पुलिस महानिदेशक (सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक) एस. डेविडसन देवासिरवाथम के तत्काल तबादले के आदेश दिए।

उनकी जगह क्रमशः एम. साई कुमार और संदीप मित्तल को नियुक्त किया गया है। आयोग का तर्क है कि यह चुनावी तैयारियों का हिस्सा है, लेकिन सत्ताधारी दल द्रमुक ने इसे आयोग का अति-उत्साह और पक्षपातपूर्ण रवैया करार दिया है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने सोशल मीडिया पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए आरोप लगाया कि आयोग भाजपा और अन्नाद्रमुक के बीच कथित गठबंधन को फायदा पहुँचाने के लिए काम कर रहा है।

उन्होंने इसे एकतरफा राजनीतिक कार्रवाई बताया। 23 अप्रैल को होने वाले मतदान से पहले राज्य की शीर्ष नौकरशाही में इस तरह का बदलाव निश्चित रूप से प्रशासन की कार्यशैली को प्रभावित करता है। यही स्थिति पश्चिम बंगाल में भी देखने को मिल रही है, जहाँ आयोग ने 483 प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के तबादले का आदेश दिया है।

हालाँकि कलकत्ता उच्च न्यायालय ने इस प्रक्रिया को सही ठहराया है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि इतने बड़े पैमाने पर फेरबदल का उद्देश्य भाजपा को राजनीतिक लाभ पहुँचाना है। निर्वाचन आयोग का मुख्य तर्क हमेशा यही रहता है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए लेवल प्लेइंग फील्ड (समान अवसर) तैयार करना आवश्यक है।

इसके लिए उन अधिकारियों को हटाना पड़ता है जो लंबे समय से एक ही स्थान पर तैनात हैं या जिन पर स्थानीय राजनीतिक प्रभाव का संदेह होता है। परंतु, जब हम आंकड़ों और राज्यों की तुलना करते हैं, तो विरोधाभास स्पष्ट दिखाई देता है। विपक्षी दलों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में करीब 500 और तमिलनाडु में शीर्ष अधिकारियों का तबादला किया गया।

भाजपा शासित राज्य असम, जहाँ भाजपा की सरकार है, वहाँ तबादलों का पैमाना काफी छोटा है। अब तक केवल पांच जिला पुलिस प्रमुखों और कुछ चुनाव अधिकारियों को ही बदला गया है। यह असमानता ही विपक्ष के उस आरोप को बल देती है कि संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल चुनिंदा तरीके से किया जा रहा है।

विपक्षी नेताओं का तर्क है कि यदि निष्पक्षता ही एकमात्र मापदंड है, तो सभी पिछले कुछ वर्षों में निर्वाचन आयोग की छवि एक कठोर और स्वतंत्र संस्था से बदलकर विवादों के घेरे में रहने वाली संस्था की बन गई है। ईवीएम प्रबंधन से लेकर मतदाता सूची में सुधार की प्रक्रियाओं तक, आयोग की हर कार्रवाई पर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं।

विशेष रूप से बंगाल और केरल जैसे राज्यों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के नाम पर जिस तरह से नाम काटे गए, उसने पहले ही संदेह का माहौल बना रखा था। अब तबादलों की इस नई लहर ने आग में घी डालने का काम किया है। जब चुनाव की तारीखें इतनी करीब हों, तब प्रशासनिक मशीनरी में व्यापक फेरबदल करने से न केवल चुनावी प्रबंधन में अस्थिरता आती है, बल्कि यह संदेश भी जाता है कि आयोग राज्य की मौजूदा व्यवस्था पर भरोसा नहीं कर रहा है।

एक जीवंत लोकतंत्र में निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता निर्विवाद होनी चाहिए। यदि आम जनता या राजनीतिक दलों के मन में आयोग की तटस्थता को लेकर रत्ती भर भी संदेह पैदा होता है, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव को कमजोर करता है। निर्वाचन आयोग को न केवल निष्पक्ष होना चाहिए, बल्कि उसकी निष्पक्षता दिखनी भी चाहिए। भाजपा शासित राज्यों और गैर-भाजपा शासित राज्यों के बीच तबादलों की संख्या में जो बड़ा अंतर दिख रहा है, उस पर आयोग को स्पष्ट और तार्किक स्पष्टीकरण देना चाहिए। चुनाव केवल अधिकारियों को बदलने से निष्पक्ष नहीं होते, बल्कि वे उन प्रक्रियाओं की पारदर्शिता से निष्पक्ष होते हैं जो सभी पक्षों के लिए समान रूप से लागू हों। यही हाल शीर्ष अदालत का भी है, जनता को जो चीजें खुली आंखों से दिख रही हैं, उन्हें सुप्रीम कोर्ट नहीं देख पा रहा है।