राज्य के अफसरों के तबादले पर मुख्यमंत्री की तीखी प्रतिक्रिया
राष्ट्रीय खबर
कोलकाताः पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में चुनाव आयोग द्वारा राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक सहित कई वरिष्ठ अफसरों के तबादले पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। मुख्यमंत्री का आरोप है कि चुनाव आयोग ने इन तबादलों के दौरान स्थापित परंपराओं का उल्लंघन किया है और राज्य सरकार से परामर्श नहीं किया।
ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लिखे पत्र में स्पष्ट किया कि आमतौर पर आयोग राज्य सरकार से तीन अधिकारियों का एक पैनल मांगता है, जिनमें से एक का चयन रिक्त पद को भरने के लिए किया जाता है। लेकिन इस बार आयोग ने सीधे तौर पर कार्रवाई की है, जो लोकतांत्रिक ढांचे में राज्यों के अधिकारों का हनन है।
पूर्व चुनाव आयुक्तों ने भी ममता बनर्जी के इस तर्क का समर्थन किया है कि तबादलों के लिए पैनल मांगना एक स्थापित परिपाटी रही है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त डॉ. एस.वाई. कुरैशी के अनुसार, चुनाव अवधि के दौरान अधिकारियों का तबादला करना आयोग का अधिकार है, लेकिन पारंपरिक रूप से इसके लिए राज्य से नामों का पैनल मांगा जाता है।
उन्होंने बताया कि बिना परामर्श के तबादला करना अत्यंत दुर्लभ मामला होता है। डॉ. कुरैशी ने मदुरै के एक पुराने मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि केवल आपातकालीन स्थितियों में ही, जहाँ तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता हो, बिना पैनल के आदेश दिए जाते हैं। अन्यथा, राज्य सरकार के अधिकारियों में से ही उपयुक्त चयन करना ही बेहतर कार्यप्रणाली मानी जाती है।
एक अन्य पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने भी इस प्रक्रिया की व्याख्या करते हुए कहा कि चुनाव की घोषणा से पहले ही उन अधिकारियों को हटाने के दिशा-निर्देश मौजूद हैं जो तीन साल से एक ही पद पर हैं या अपने गृह जिले में तैनात हैं। चुनाव आयोग मुख्य सचिव से इसका प्रमाण पत्र भी लेता है।
हालांकि, चुनाव की घोषणा के बाद यदि किसी अधिकारी के खिलाफ शिकायत मिलती है या दिशा-निर्देशों का पालन नहीं होता, तो आयोग के पास उसे हटाने का पूर्ण अधिकार है। फिर भी, पैनल मांगना एक ऐसी प्रक्रिया है जो पारदर्शिता और राज्य-केंद्र के समन्वय को बनाए रखती है। इस विवाद ने एक बार फिर चुनाव के दौरान संवैधानिक संस्थाओं और राज्य सरकारों के बीच शक्ति संतुलन की बहस को तेज कर दिया है।