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सुरक्षा में ठेकेदारी बंद करे भारत

हाल के दिनों में ईरान से आई सुरक्षा संबंधी खबरों ने पूरी दुनिया, विशेषकर सामरिक रणनीतिकारों को चौंका दिया है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के अत्यंत सुरक्षित माने जाने वाले क्षेत्रों के सीसीटीवी नेटवर्क को बड़े पैमाने पर हैक कर लिया गया। इस तकनीकी सेंधमारी का उपयोग कथित तौर पर इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद और अमेरिकी एजेंसी सीआईए द्वारा ईरानी नेतृत्व की पल-पल की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया गया।

परिणाम अत्यंत विनाशकारी रहे—सटीक खुफिया जानकारी के आधार पर किए गए हमलों में ईरान के शीर्ष नेतृत्व का लगभग सफाया हो गया। यह घटना महज एक सैन्य विफलता नहीं है, बल्कि आधुनिक युग में डिजिटल जासूसी की मारक क्षमता का एक भयावह उदाहरण है। आउटसोर्सिंग का जोखिम और सस्ते की भारी कीमत ईरान का यह घटनाक्रम भारत जैसे तेजी से डिजिटल हो रहे राष्ट्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

ईरान ने अपने सुरक्षा तंत्र के लिए जिन तकनीकों और उपकरणों का सहारा लिया, उनमें से कई बाहरी स्रोतों से प्राप्त किए गए थे। जब कोई राष्ट्र अपनी सुरक्षा व्यवस्था, विशेषकर निगरानी तंत्र को आउटसोर्स करता है या बाहरी मदद पर निर्भर होता है, तो वह अनजाने में अपने घर की चाबियां किसी और को सौंप देता है। अक्सर बजट की सीमाओं के कारण सरकारी और निजी संस्थान सबसे कम बोली वाले वेंडर को चुनते हैं। सुरक्षा के क्षेत्र में यह सस्ता विकल्प अंततः सबसे महंगा साबित हो सकता है।

यदि हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर में गुप्त रास्ता छोड़ दिया जाए, तो दुनिया के किसी भी कोने में बैठा हैकर आपके बेडरूम या रणनीतिक मीटिंग रूम की गतिविधियों को लाइव देख सकता है। भारत में चाइनीज कैमरों का जाल: एक सोता हुआ खतरा है। भारत के संदर्भ में स्थिति और भी चिंताजनक है।

आज भारत के लगभग हर शहर, सरकारी दफ्तर, रेलवे स्टेशन और यहां तक कि संवेदनशील रक्षा प्रतिष्ठानों के आसपास भी चीनी निर्मित सीसीटीवी कैमरों की भरमार है। हिकविजन और दहुआ जैसी कंपनियों के कैमरे अपनी कम कीमत के कारण भारतीय बाजार पर कब्जा जमाए हुए हैं। तकनीकी विशेषज्ञों ने बार-बार आगाह किया है कि इन कैमरों के फर्मवेयर में ऐसी खामियां हो सकती हैं जो डेटा को सीधे विदेशी सर्वरों, विशेषकर चीन को भेज सकती हैं।

यदि ईरान में मोसाद और सीआईए ने सीसीटीवी हैक कर नेतृत्व को निशाना बनाया, तो भारत के मामले में यह खतरा और भी बड़ा है क्योंकि हमारा एक प्रमुख पड़ोसी देश तकनीकी युद्ध में अत्यंत सक्षम है और उसके साथ हमारे संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। स्वदेशीकरण ही एकमात्र विकल्प है। ईरान से सबसे बड़ा सबक यह मिलता है कि सुरक्षा संबंधी इंतजामों को बाहरी भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

भारत को अब मेक इन इंडिया से आगे बढ़कर डिजाइन इन इंडिया और सिक्योर इन इंडिया पर ध्यान देना होगा। हमें एक ऐसी पारिस्थितिकी विकसित करनी होगी जहां सीसीटीवी कैमरों के चिपसेट से लेकर उनके क्लाउड सर्वर तक सब कुछ भारत के नियंत्रण में हो। आगे की राह: क्या करना चाहिए? समय आ गया है कि भारत सरकार एक चरणबद्ध और समयबद्ध रणनीति अपनाए कि देश के सभी संवेदनशील इलाकों में लगे विदेशी, विशेषकर चीनी कैमरों का तत्काल तकनीकी ऑडिट किया जाए।

यह पता लगाया जाए कि क्या ये कैमरे किसी विदेशी आईपी एड्रेस पर डेटा भेज रहे हैं। रणनीतिक क्षेत्रों से विदेशी निगरानी उपकरणों को हटाकर वहां स्वदेशी और प्रमाणित उपकरणों को लगाया जाना चाहिए। सीसीटीवी और अन्य निगरानी उपकरणों के लिए सुरक्षा मानकों को इतना सख्त बनाया जाए कि कोई भी अविश्वसनीय कंपनी भारतीय बाजार में प्रवेश न कर सके।

आम नागरिकों और निजी सुरक्षा एजेंसियों को भी यह समझाना होगा कि सस्ता कैमरा उनकी गोपनीयता के लिए कितना बड़ा खतरा हो सकता है। ईरान की त्रासदी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य के युद्ध सीमाओं पर कम और सर्वरों पर ज्यादा लड़े जाएंगे। सटीक हमले के लिए अब जासूसों को जमीन पर उतरने की जरूरत नहीं है; एक हैक किया गया कैमरा ही दुश्मन का काम आसान कर देता है।

भारत को अपनी डिजिटल संप्रभुता की रक्षा के लिए अब जागना होगा। हमें यह समझना होगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में आउटसोर्सिंग और मितव्ययिता के बजाय आत्मनिर्भरता और सतर्कता ही सबसे बड़े हथियार हैं। यदि हमने आज अपनी निगरानी प्रणाली की जांच नहीं की, तो कल की कोई भी बड़ी चूक हमें ईरान जैसी स्थिति में खड़ा कर सकती है।

मेक इन इंडिया का ढोल पीटने से यह चुनौती कम नहीं होती। इसके लिए भारत सरकार को भी आगे बढ़कर पहल करनी होगी। कमसे कम चंद सीसीटीवी कैमरों से निकली सूचनाएं भारत के अलावा कहीं और जा रही है अथवा नहीं, इसकी जांच सहज है तो कमसे कम इसी किस्म की पहल से सुरक्षा सुधार में काम हो।