आयोजन और प्रदर्शन दोनों में संयम जरूरी था
जब कोई सरकार किसी वैश्विक तकनीकी शिखर सम्मेलन की मेजबानी करती है, तो वह एक मौन वादा करती है—कि वह अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को अपनी कार्यकुशलता के साथ मेल खाने देगी। हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट का उद्देश्य भारत के इसी आत्मविश्वास को प्रदर्शित करना था।
सरकार का लक्ष्य दुनिया को यह दिखाना था कि भारत अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इसके नियमन और भविष्य के नवाचारों पर वैश्विक विमर्श को दिशा देने के लिए पूरी तरह तैयार है। लेकिन, इस सम्मेलन के बाद जो छवि सार्वजनिक स्मृतियों में शेष रह गई, वह उस वैश्विक नेतृत्व की नहीं, बल्कि प्रशासनिक अव्यवस्था, अत्यधिक सुरक्षा तामझाम और एक ऐसे राजनीतिक तमाशे की थी, जिसने उन गंभीर चर्चाओं को पूरी तरह ढक लिया जो शायद सम्मेलन कक्षों के भीतर हुई होंगी।
इस आयोजन की सबसे बड़ी विफलता इसके प्रबंधन में थी। अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों को मनमाने प्रतिबंधों और अंतिम समय में किए गए बदलावों का सामना करना पड़ा। आयोजन स्थल पर जिस स्तर का सुरक्षा तमाशा खड़ा किया गया था, उसने सामान्य नागरिकों के लिए असुविधा पैदा करने के अलावा सुरक्षा के मानकों में कोई वास्तविक मूल्य नहीं जोड़ा। ये छोटी दिखने वाली विवरण महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि शिखर सम्मेलन केवल भाषणों के बारे में नहीं होते; वे देश की प्रशासनिक क्षमता का संकेत देते हैं।
जब कोई सरकार भीड़ नियंत्रण, प्रवेश पास या बुनियादी समन्वय जैसी सामान्य चीजों में संघर्ष करती है, तो वह एआई जैसी जटिल और संवेदनशील तकनीक की विश्वसनीय संचालक होने के अपने ही दावे को कमजोर कर देती है। कूटनीति और वैश्विक मंचों पर दृष्टिकोण ही सब कुछ नहीं होते, लेकिन वे कुछ भी नहीं भी नहीं होते। इसका नतीजा था कि वहां आये प्रतिनिधियों को काफी दूर पैदल चलना पड़ा और आयोजन स्थल पर आम इलेक्ट्रानिक उपकरणों से संबंधित संसाधनों का भी घोर अभाव था।
सम्मेलन के दौरान भारतीय युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया भद्दा प्रदर्शन इस आयोजन का दूसरा सबसे निराशाजनक पहलू था। इन लोगों ने रणनीति के बजाय तमाशे को चुना और शर्टलेस प्रदर्शन व नारेबाजी के जरिए कार्यक्रम में व्यवधान डाला। एक जीवंत लोकतंत्र में विरोध न केवल वैध है, बल्कि आवश्यक भी है। लेकिन हर विरोध का प्रभाव समान नहीं होता। इस प्रदर्शन ने एक दुर्लभ उपलब्धि हासिल की: इसने ध्यान को सरकार की प्रशासनिक विफलताओं से हटाकर विपक्ष की विवेकहीनता पर केंद्रित कर दिया। रातों-रात बातचीत का रुख बदल गया—राज्य की क्षमता और नीतिगत गंभीरता पर सवाल उठने के बजाय, शिष्टाचार, राष्ट्रवाद और शर्मिंदगी पर बहस छिड़ गई।
यह बदलाव नरेंद्र मोदी सरकार के लिए एक उपहार जैसा था। सरकार को अपनी प्रशासनिक चूक का बचाव करने या यह बताने की आवश्यकता नहीं पड़ी कि भारत का एआई रोडमैप कैसा है। इसके बजाय, मंत्री और समर्थक जिम्मेदार शासन बनाम राजनीतिक अराजकता का विमर्श खड़ा करने में सफल रहे। एक खराब तरीके से निष्पादित शिखर सम्मेलन को बहुत चालाकी से अराजक विरोधियों की कहानी में बदल दिया गया। राजनीति में, इसे केवल नुकसान की भरपाई नहीं, बल्कि एक नैरेटिव एस्केप कहते हैं।
यदि हम केवल इन घटनाओं का सतही विश्लेषण करेंगे, तो हम उस गहरी हताशा को नजरअंदाज कर देंगे जो इस प्रकरण ने उजागर की है। आज समाज का एक वर्ग ऐसी भद्दी प्रदर्शनकारी राजनीति को सही ठहराने के लिए मजबूर महसूस कर रहा है, जो व्यापक हताशा की ओर इशारा करती है। आज संसद को अक्सर पूर्व-नियोजित माना जाता है।
टेलीविजन समाचारों का एक बड़ा हिस्सा सत्ता से सवाल पूछने के बजाय चीयरलीडर्स की भूमिका में है। न्यायिक प्रक्रियाएं या तो बहुत धीमी हैं, या चयनात्मक हैं। ऐसे वातावरण में, कुछ लोगों को नाटकीय विरोध ही एकमात्र रास्ता लगता है जिससे वे ध्यान खींच सकें। किसी भी लोकतंत्र के लिए यह एक अत्यंत भयावह निदान है। यह एक ऐसी व्यवस्था का संकेत है जहाँ सरकार की विश्वसनीयता केवल एक समस्या-ग्रस्त शिखर सम्मेलन से ही नहीं गिर रही है, बल्कि विपक्ष की विश्वसनीयता भी एक मूर्खतापूर्ण स्टंट से धूमिल हो रही है।
भारत प्रशासनिक चूक और प्रदर्शनकारी आक्रोश के बीच के इस असंतुलित समझौते से कहीं बेहतर का हकदार है। यदि भारत एआई जैसे गंभीर विषय पर वैश्विक नेतृत्व करना चाहता है, तो उसे सबसे पहले दो पुरानी लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीकों को पुनः प्राप्त करना होगा: संस्थागत क्षमता और राजनीतिक संयम। विदेशी मीडिया में इस आयोजन के बारे में जो खबरें छपी है, उनमें शर्ट उतारकर प्रदर्शन का बहुत कम जिक्र है। पश्चिमी देशों के मीडिया प्रतिनिधियों ने आयोजन की खामियों की तरफ ज्यादा ध्यान आकृष्ट किया है। इससे साफ हो जाता है कि सरकार द्वारा हर ऐसे आयोजन को एक प्रचार का इवेंट बनाने को विदेशी अतिथियों ने पसंद नहीं किया है। इससे सभी पक्षों को सबक लेने की जरूरत है।